उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सिविल जज की बर्खास्तगी रद्द की, जांच को “बिना नींव की इमारत” करार दिया

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पूर्व सिविल जज (सीनियर डिवीजन) दीपाली शर्मा को सेवा से हटाने के आदेश को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने उन्हें परिणामी वरिष्ठता (consequential seniority) और 50% बकाया वेतन के साथ सेवा में बहाल करने का आदेश दिया है। 6 जनवरी, 2026 को दिए गए एक फैसले में, चीफ जस्टिस जी. नरेंद्र और जस्टिस सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच को “बिना सबूत” का मामला और “बिना नींव की एक सावधानीपूर्वक तैयार की गई इमारत” (carefully crafted edifice without a foundation) करार दिया।

कोर्ट ने दीपाली शर्मा द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार कर लिया, जिसमें उन्होंने राज्य सरकार और हाईकोर्ट प्रशासन द्वारा अक्टूबर 2020 में जारी बर्खास्तगी आदेशों को चुनौती दी थी।

मामले की पृष्ठभूमि

दीपाली शर्मा के खिलाफ कार्यवाही की शुरुआत 10 जनवरी, 2018 को प्राप्त एक अज्ञात ईमेल शिकायत से हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि हरिद्वार में तैनात शर्मा अपने सरकारी आवास (जजेस कॉलोनी) में एक नाबालिग लड़की को नौकरानी के रूप में रखकर उसका शारीरिक शोषण कर रही थीं।

शिकायत पर कार्रवाई करते हुए, 29 जनवरी, 2018 को तत्कालीन जिला जज, हरिद्वार ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) सहित एक पुलिस टीम के साथ आवास पर “छापा” मारा। लड़की, तनुजा उर्फ तिरुजा दानी, को वहां से हटाकर एक आश्रम में रखा गया। प्रारंभिक रिपोर्ट के बाद, शर्मा को निलंबित कर दिया गया और एक विभागीय जांच शुरू की गई।

आरोप पत्र में उत्तराखंड सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 2002 के नियम 3(1) और 3(2) के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। उन पर आरोप था कि उन्होंने एक नाबालिग को घरेलू नौकर के रूप में रखकर और उसे प्रताड़ित करके पूर्ण सत्यनिष्ठा और कर्तव्य के प्रति समर्पण बनाए रखने में विफलता दिखाई। जांच अधिकारी ने आरोपों को सही पाया, जिसके बाद 14 अक्टूबर, 2020 और 20 अक्टूबर, 2020 के आदेशों के माध्यम से उन्हें सेवा से हटा दिया गया।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजेंद्र डोभाल ने तर्क दिया कि जांच पूर्वाग्रह, साजिश और सबूतों की कमी से दूषित थी। यह तर्क दिया गया कि अज्ञात शिकायत एक पड़ोसी अतिरिक्त जिला जज (PW-1) की पत्नी से उत्पन्न हुई थी, जिनके साथ याचिकाकर्ता के संबंध तनावपूर्ण थे। शर्मा ने तर्क दिया कि लड़की नाबालिग नहीं थी, जिसकी पुष्टि ऑसिफिकेशन टेस्ट (ossification test) से हुई थी, जिसमें उसकी उम्र लगभग 17 वर्ष बताई गई थी। उन्होंने कहा कि लड़की को परिवार के सदस्य की तरह शिक्षित किया जा रहा था, न कि नौकरानी की तरह रखा गया था।

विभाग ने पड़ोसी जज (PW-1), पुलिस अधिकारियों और लड़की पर 20 चोटों का आरोप लगाने वाली मेडिकल रिपोर्ट पर भरोसा किया। उन्होंने तर्क दिया कि जांच के दौरान लड़की द्वारा दुर्व्यवहार से इनकार करना याचिकाकर्ता द्वारा उसे “अपने पक्ष में कर लेने” (won over) का परिणाम था।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी (IO) के निष्कर्षों को खारिज करते हुए स्पष्ट प्रक्रियात्मक खामियों और ठोस सबूतों की कमी की ओर इशारा किया।

1. “छापा” और पूर्व-निर्धारण: कोर्ट ने “छापे” के तरीके पर हैरानी जताई और कहा कि बिना सर्च वारंट के एक महिला न्यायिक अधिकारी के घर को “पुलिस की बटालियन” और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा घेर लिया गया। पीठ ने टिप्पणी की:

“तरीका और विधि सवाल खड़े करती है और हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या यह अतिशयोक्ति (over-kill) या प्रेरित मामला है? … हमारी राय में, सशस्त्र कर्मियों द्वारा घर को घेरना एक अतिरेकपूर्ण कृत्य था और जिला जज को प्रदत्त जनादेश से अधिक था।”

2. मेडिकल साक्ष्य: कोर्ट ने इसे “चिंताजनक” पाया कि 20 चोटों का विवरण देने वाले मेडिकल प्रमाणपत्र को जांच में एक स्टाफ नर्स और एक फार्मासिस्ट द्वारा साबित किया गया, न कि किसी योग्य डॉक्टर द्वारा। कोर्ट ने मूल प्रमाण पत्र और केस हिस्ट्री की अनुपस्थिति को भी नोट किया।

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3. कथित पीड़िता की गवाही: महत्वपूर्ण रूप से, लड़की (PW-2) ने जांच के दौरान शर्मा के पक्ष में गवाही दी। उसने पीटे जाने या भूखा रखे जाने से साफ इनकार किया और कहा कि चोटें साइकिल और पेड़ से गिरने के कारण लगी थीं। उसने आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारियों ने उसे शर्मा को फंसाने के लिए धमकाया था। जांच अधिकारी ने इस गवाही को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि गवाह को “मिला लिया गया” है।

हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी के निष्कर्ष को खारिज करते हुए कहा:

“इतनी विस्तृत और गहन पूछताछ के बावजूद, एक भी ऐसी बात सामने नहीं आई जो संदेह पैदा करे… जांच अधिकारी ने लड़की (PW-2) के साक्ष्य को एक पंक्ति के निष्कर्ष के साथ खारिज कर दिया कि उसे मिला लिया गया है।”

4. पड़ोसी जज (PW-1) की भूमिका: कोर्ट ने उस साक्ष्य को गंभीरता से लिया जिसमें अज्ञात शिकायत ईमेल को पड़ोसी जज (PW-1) की पत्नी के नाम पर पंजीकृत मोबाइल नंबर से जोड़ा गया था। कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी यह समझने में विफल रहे कि PW-1 “कर्तव्य की पुकार से परे” (beyond the call of duty) कार्य कर रहे थे।

5. सर्वश्रेष्ठ गवाहों की जांच न करना: कोर्ट ने सवाल उठाया कि विभाग ने शर्मा के आवास पर तैनात दो कोर्ट चपरासियों से पूछताछ क्यों नहीं की, जो किसी भी कथित दुर्व्यवहार के सबसे अच्छे प्रत्यक्षदर्शी हो सकते थे। पीठ ने टिप्पणी की:

“इन दो चपरासियों से पूछताछ क्यों नहीं की गई, यह एक मिलियन डॉलर का सवाल है… हमारी सुविचारित राय में, जांच अधिकारी और विभाग की यह चूक आरोपों की जड़ पर प्रहार करती है।”

6. बाल श्रम का आरोप: कोर्ट ने रेखांकित किया कि हालांकि याचिकाकर्ता को कदाचार के लिए दंडित किया गया था, लेकिन नियम 3(4) (14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को रोजगार देने पर प्रतिबंध) के तहत कोई विशिष्ट आरोप तय नहीं किया गया था। इसके अलावा, साक्ष्यों से पता चला कि लड़की लगभग 17 वर्ष की थी।

7. प्रारंभिक जांच पर निर्भरता: सुप्रीम कोर्ट के निर्मला जे. झाला बनाम गुजरात राज्य के फैसले का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी ने याचिकाकर्ता की पीठ पीछे तैयार की गई प्रारंभिक जांच रिपोर्ट पर व्यापक रूप से भरोसा करके गलती की, जबकि वास्तविक अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान दर्ज साक्ष्यों की अनदेखी की।

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निर्णय

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि जांच रिपोर्ट “अटकलों और अनुमानों” (conjectures and surmises) और वस्तुनिष्ठ साक्ष्य के बजाय व्यक्तिपरक संतुष्टि पर आधारित थी।

“जांच अधिकारी ने ‘राई का पहाड़’ (mountain out of a molehill) बनाने का प्रयास किया है… हम पाते हैं कि याचिकाकर्ता को एक गैर-मौजूद आरोप के कदाचार का गलत दोषी ठहराया गया है।”

हाईकोर्ट ने 9 जून, 2020 की जांच रिपोर्ट और उसके बाद के निष्कासन आदेशों को रद्द कर दिया। याचिकाकर्ता को सेवा में निरंतर माना गया है। पूर्ण वरिष्ठता प्रदान करते हुए, कोर्ट ने मौद्रिक लाभों को बकाया राशि के 50% तक सीमित कर दिया, यह कहते हुए कि “बिना काम किए 100% बकाया भुगतान करना राज्य के खजाने पर अनुचित बोझ होगा।”

केस विवरण:

  • केस टाइटल: दीपाली शर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य और अन्य
  • केस नंबर: रिट याचिका (एस/बी) संख्या 266 ऑफ 2021
  • कोरम: चीफ जस्टिस जी. नरेंद्र और जस्टिस सुभाष उपाध्याय
  • याचिकाकर्ता के वकील: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री राजेंद्र डोभाल (सहायता में श्री आदित्य प्रताप सिंह)
  • हाईकोर्ट के वकील: श्री शोभित सहारिया
  • राज्य के वकील: श्री गजेंद्र त्रिपाठी

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