उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) दीपाली शर्मा की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए उन्हें सेवा में बहाल करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि उनके खिलाफ की गई जांच में गंभीर खामियां थीं और आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिले।
मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने 14 अक्टूबर 2020 को पारित पूर्णपीठ प्रस्ताव और उसके आधार पर जारी सरकारी आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि जांच प्रक्रिया दोषपूर्ण थी।
दीपाली शर्मा पर आरोप था कि हरिद्वार में सिविल जज के पद पर कार्यकाल के दौरान उन्होंने एक 14 वर्षीय लड़की को अपने सरकारी आवास पर रखा, उससे घरेलू काम करवाया, स्वास्थ्य की अनदेखी की और उसे शारीरिक नुकसान पहुंचाया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि लड़की और उसके पिता—जो इस मामले में प्रमुख गवाह थे—ने इन सभी आरोपों से इनकार किया और कहा कि जज ने उनके साथ अच्छा व्यवहार किया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि 2018 में दीपाली शर्मा के हरिद्वार स्थित आवास पर जो छापा मारा गया, वह बिना तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के. एम. जोसेफ की अनुमति के हुआ। न तो कोई पूर्व स्वीकृति रिकॉर्ड पर पाई गई और न ही आस-पास रहने वाले किसी भी न्यायिक अधिकारी ने किसी प्रकार के दुर्व्यवहार की पुष्टि की।
कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि एक महिला न्यायिक अधिकारी के घर पर छापा मारने के लिए 18–20 अधिकारियों की टीम की आवश्यकता क्यों पड़ी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शर्मा पर लगाए गए आरोप उत्तराखंड सरकारी सेवक नियमावली, 2002 के तहत ‘आचरण’ और ‘निष्ठा’ से संबंधित थे। बाल श्रमिक रखने या नाबालिग से काम लेने जैसे किसी विशेष नियम का हवाला नहीं दिया गया।
इन सभी तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने माना कि जांच प्रक्रिया अवैधानिक, भ्रामक और पूर्वाग्रह से ग्रस्त थी।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि दीपाली शर्मा को ऐसा माना जाएगा मानो उन्हें कभी सेवा से हटाया ही नहीं गया। उनकी वरिष्ठता भी बनी रहेगी। हालांकि, कोर्ट ने उन्हें केवल 50 प्रतिशत सेवा लाभ देने का निर्देश दिया है जो बर्खास्तगी की अवधि के लिए देय होंगे।
इस फैसले को न्यायिक अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही में प्रक्रिया-सम्मत जांच की आवश्यकता और निष्पक्षता की जोरदार पुनः पुष्टि के रूप में देखा जा रहा है।

