उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नंदा देवी उत्सव के दौरान बकरे की बलि की परंपरा को अनुमति देते हुए साफ किया है कि यह केवल मंदिर से दूर निर्धारित स्थल पर बने वधशाला (स्लॉटरहाउस) में ही हो सकेगी।
मुख्य न्यायाधीश गुहनाथन नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने शुक्रवार को यह आदेश पारित किया। अदालत जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें परंपरा को जारी रखने की मांग की गई थी।
अदालत ने नगर परिषद को उपयुक्त जमीन चिन्हित कर वधशाला बनाने का निर्देश दिया और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से ‘अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC)’ जारी करने को कहा। साथ ही, बलि प्रक्रिया पर निगरानी रखने के लिए खाद्य निरीक्षक की नियुक्ति करने का भी आदेश दिया।

यह आदेश ऐसे समय आया है जब 2015 से नैना देवी मंदिर परिसर में पशु बलि पर पूर्ण प्रतिबंध है। इसके बाद से कई भक्त बकरे की जगह नारियल चढ़ाकर परंपरा निभा रहे हैं। मंदिर परिसर में नारियल अर्पित करने के लिए अलग स्थान निर्धारित किया गया है।
यह PIL स्थानीय निवासी पवन जाटव और अन्य ने दायर की थी। उन्होंने दलील दी कि बलि पर प्रतिबंध से श्रद्धालुओं की आस्था प्रभावित हो रही है, जबकि नंदा देवी उत्सव में यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।
वहीं, पीपल फॉर एनिमल्स (PFA) की पशु अधिकार कार्यकर्ता गौरी मौलेखी ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर पशु बलि पर्यावरण को नुकसान पहुँचाती है और इसे अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
खंडपीठ ने श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं और पर्यावरणीय चिंताओं के बीच संतुलन बनाते हुए बलि की अनुमति केवल वधशाला में देने का निर्णय किया।
अदालत के इस आदेश से श्रद्धालुओं को परंपरा निभाने का अवसर मिलेगा, वहीं मंदिर परिसर में पशु प्रवेश और बलि पर रोक यथावत बनी रहेगी।