इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने किरायेदारी विवाद से जुड़ी 30 साल पुरानी रिट याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता एम/एस व्होरा ब्रदर्स पर ₹15 लाख का जुर्माना लगाया है। न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने टिप्पणी की कि किरायेदार ने 1979 से किराया नहीं दिया और जानबूझकर मुकदमेबाज़ी को 45 वर्षों तक लटकाया, जिससे “पूरी एक पीढ़ी” का नुकसान हो गया।
यह फैसला रिट-अ संख्या 1000097/1995 में आया, जिसमें न्यायालय ने किरायेदार की ओर से दायर याचिका को खारिज कर उस अपीली आदेश को बरकरार रखा जिसमें मकानमालकिन श्रीमती कस्तूरी देवी के पक्ष में वाणिज्यिक संपत्ति की मुक्ति का आदेश दिया गया था। न्यायालय ने किरायेदार के आचरण को “कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग” करार दिया और दो महीने में न चुकाए जाने की स्थिति में ₹15 लाख की राशि को ज़मीन राजस्व के बकाए की तरह वसूलने का निर्देश जिलाधिकारी, लखनऊ को दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद की शुरुआत वर्ष 1982 में हुई जब श्रीमती कस्तूरी देवी, जो कि लखनऊ के फ़ैज़ाबाद रोड स्थित 498/239 नंबर की संपत्ति की मकानमालकिन थीं, ने उत्तर प्रदेश नगरीय भवन (किराया, किरायेदारी और बेदखली विनियमन) अधिनियम, 1972 की धारा 21(1)(a) के तहत रिक्तिकरण याचिका दाखिल की। उन्होंने यह संपत्ति अपने स्नातक बेटे के लिए औद्योगिक इकाई स्थापित करने हेतु मांगी थी।

उस समय संपत्ति एम/एस व्होरा ब्रदर्स के कब्ज़े में थी, जो ₹187.50 प्रतिमाह किराया दे रहे थे। 1992 में प्राधिकृत अधिकारी ने श्रीमती देवी की याचिका यह कहकर खारिज कर दी कि उनकी आवश्यकता प्रमाणिक नहीं है। लेकिन 1995 में अपीलीय प्राधिकारी ने आदेश पलटते हुए उन्हें संपत्ति की मुक्ति प्रदान की।
इस आदेश को एम/एस व्होरा ब्रदर्स ने हाईकोर्ट में चुनौती दी, और याचिका लगभग 30 वर्षों तक लंबित रही।
प्रमुख कानूनी प्रश्न व निष्कर्ष
1. उप-किरायेदारी और किरायेदारी अधिकारों का दुरुपयोग
न्यायालय ने पाया कि हालांकि किरायेदारी एम/एस व्होरा ब्रदर्स के नाम थी, लेकिन संपत्ति का प्रयोग एम/एस व्होरा ब्रदर्स एंड कंपनी द्वारा किया जा रहा था, जो 1973 में स्थापित एक अलग साझेदारी थी। यह उप-किरायेदारी की श्रेणी में आता है और धारा 12 का उल्लंघन करता है।
“स्पष्ट है कि एम/एस व्होरा ब्रदर्स एंड कंपनी की स्थापना उप-किरायेदारी का मामला है… और धारा 12 के अधीन दोषपूर्ण है।”
2. वास्तविक आवश्यकता और तुलनात्मक कठिनाई
न्यायालय ने कहा कि मकानमालकिन को यह निर्णय लेने का अधिकार है कि कौन-सी संपत्ति उनके उद्देश्य के लिए उपयुक्त है, न कि किरायेदार को।
“मकानमालकिन ही यह तय करने के लिए उपयुक्त व्यक्ति हैं कि उनका व्यवसाय किस स्थान पर चलेगा। किरायेदार को शर्तें तय करने का कोई अधिकार नहीं।”
न्यायालय ने यह भी कहा कि किरायेदार यह साबित नहीं कर सके कि मकानमालकिन के पास जो अन्य संपत्तियां थीं, वे औद्योगिक इकाई के लिए उपयुक्त थीं।
3. विलंब, किराया न देना, और प्रक्रिया का दुरुपयोग
किरायेदार ने 1 अप्रैल 1979 से कोई किराया नहीं दिया और इस दावे का कोई खंडन नहीं किया। संपत्ति का उपयोग नहीं हुआ और याचिकाकर्ता की रणनीति केवल न्याय प्रक्रिया को बाधित करने के लिए थी।
“किरायेदार ने 1982 से ही मकानमालकिन के प्रयासों को विफल किया। मुकदमे की पूरी रणनीति न्यायिक निर्णय को टालने के लिए थी।”
अंतिम आदेश और निर्देश
- रिट याचिका खारिज।
- याचिकाकर्ताओं पर ₹15 लाख का जुर्माना, जो दो माह में न चुकाए जाने की स्थिति में जमीन राजस्व के बकाए की तरह वसूल किया जाएगा।
- न्यायालय ने निष्पादन न्यायालय को निर्देश दिया कि तीन सप्ताह में मकानमालकिन के वारिसों को संपत्ति का खाली कब्ज़ा सौंपा जाए।
- निष्पादन न्यायालय और जिलाधिकारी, लखनऊ को अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश।
- आदेश की प्रति जनपद न्यायाधीश और जिलाधिकारी लखनऊ को भेजी गई।
न्यायालय ने अपने आदेश के अंत में परिवार को हुए अपूरणीय नुकसान पर गहरा खेद व्यक्त किया:
“उनके बेटे का पूरा व्यवसायिक करियर एक ऐसे किरायेदार द्वारा बर्बाद कर दिया गया जिसने न तो किराया दिया, न ही न्याय प्रक्रिया का सम्मान किया — और 45 साल तक मामले को लटकाए रखा।”
कानूनी प्रतिनिधित्व
- याचिकाकर्ता (एम/एस व्होरा ब्रदर्स): अधिवक्ता वीरेंद्र मिश्रा, आलोक सिन्हा, संदीप दीक्षित
- प्रतिवादी (श्रीमती कस्तूरी देवी एवं अन्य): वरिष्ठ अधिवक्ता बी.सी. अग्रवाल, पीयूष कुमार अग्रवाल, वरदराज एस. ओझा
(अतिरिक्त तर्क प्रस्तुत किए गए गौरव मेहरोत्रा और सुश्री अलीना मसोदी द्वारा)