तेलंगाना हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए 16 वर्षों से अलग रह रहे एक दंपती के विवाह विच्छेद (तलाक) को मंजूरी दे दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पति और उसके परिवार के खिलाफ बेबुनियाद आपराधिक मुकदमा दर्ज कराना और लंबे समय तक अलग रहना स्पष्ट रूप से मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है। इसके साथ ही जस्टिस के. लक्ष्मण और जस्टिस बी. आर. मधुसूदन राव की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के वर्ष 2017 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पति की तलाक याचिका खारिज कर दी गई थी।
वैवाहिक रिश्ते को जबरन जारी रखने का कोई औचित्य नहीं: हाईकोर्ट
पीठ ने 18 सितंबर के अपने आदेश में कहा कि दोनों पक्षों के आचरण से यह साफ है कि किसी भी तरफ से वैवाहिक जीवन को आगे बढ़ाने की कोई इच्छा शेष नहीं बची है। अदालत ने उल्लेख किया कि जब 2010 में तलाक की अर्जी दाखिल की गई थी, तब पति की उम्र 33 वर्ष और पत्नी की उम्र 27 वर्ष थी। वर्तमान में पति 49 वर्ष और पत्नी 42 वर्ष के हो चुके हैं और दोनों करीब 16 वर्षों से एक-दूसरे से पूरी तरह अलग रह रहे हैं।
सुनवाई के दौरान पति ने दो टूक शब्दों में कहा कि वह अब पत्नी के साथ दोबारा रहने या उसे अपनाने के लिए कतई तैयार नहीं है। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि इतने लंबे अलगाव के बावजूद दोनों में से किसी ने भी साथ रहने का कोई सार्थक प्रयास नहीं किया। अदालत ने माना कि ऐसी परिस्थिति में विवाह को औपचारिक रूप से जारी रखने का कोई मतलब नहीं है और यह दोनों पक्षों के लिए सिर्फ मानसिक संताप का कारण बनेगा।
विवाह के कुछ माह बाद ही शुरू हो गई थी अनबन
दोनों का विवाह वर्ष 2007 में हुआ था। पति का आरोप था कि शादी के महज तीन से चार महीने बाद ही विवाद शुरू हो गया। उसने दावा किया कि पत्नी ने उसे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया, उस पर ‘कठपुतली पति’ बनने का दबाव डाला और वैवाहिक जिम्मेदारियों को निभाने से मना कर दिया। पति ने यह भी आरोप लगाया कि विरोध करने पर पत्नी ने उसके साथ शारीरिक मारपीट की।
पति के अनुसार, पत्नी के माता-पिता उसे समझाने के लिए करीब 10 दिनों के लिए अपने घर ले गए थे, लेकिन लौटने के बाद भी उसका रवैया नहीं बदला। इसके बाद वर्ष 2008 से दोनों एक ही घर में अलग-अलग कमरों में रहने लगे। वर्ष 2009 में पत्नी ससुराल छोड़कर अपने मायके चली गई। दूसरी तरफ, पत्नी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए पति और ससुराल वालों पर प्रताड़ना, मारपीट और वैवाहिक जीवन में लगातार दखलंदाजी के आरोप लगाए।
आपराधिक मामले में बरी होना मानसिक क्रूरता का पुख्ता आधार
यह विवाद वर्ष 2010 में उस वक्त और बढ़ गया जब पत्नी और उसके पिता ने वीमेंस प्रोटेक्शन सेल का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद पति और उसके परिजनों के खिलाफ दहेज निषेध अधिनियम और क्रूरता से संबंधित धाराओं में आपराधिक मामला दर्ज कराया गया। इस आपराधिक कार्रवाई के बाद पति ने 2010 में ही क्रूरता के आधार पर फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की।
फैमिली कोर्ट ने 2017 में ठोस सबूतों के अभाव का हवाला देकर पति की अर्जी खारिज कर दी थी। हालांकि, पति और उसके परिवार के खिलाफ चल रहा आपराधिक मुकदमा वर्ष 2020 में बरी होने के साथ खत्म हुआ, जिसे 2025 में अपील खारिज होने के बाद भी बरकरार रखा गया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कानून में क्रूरता की कोई बंधी-बंधाई परिभाषा नहीं है और यह प्रत्येक मामले के तथ्यों, परिस्थितियों और पक्षों के सामाजिक-आर्थिक परिवेश पर निर्भर करती है। अदालत ने कहा कि छिटपुट विवादों के बजाय पक्षों के समग्र आचरण को देखना जरूरी है। लगातार झगड़े, अपमानजनक बर्ताव, मानसिक प्रताड़ना, अभद्र भाषा, मनमाना त्याग और झूठे आपराधिक आरोप क्रूरता की श्रेणी में आते हैं।
खंडपीठ ने यह भी पाया कि पत्नी द्वारा लगाए गए दहेज उत्पीड़न के आरोप अस्पष्ट और निराधार थे। दहेज का आरोप उसने पहली बार जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) के दौरान बिना किसी ठोस ब्योरे के लगाया था। इसी तरह, जेवरात हड़पने के आरोप पर भी पत्नी के बयान में विरोधाभास पाया गया, क्योंकि उसने खुद अलमारी की चाबी अपने पास होने की बात स्वीकार की थी।
हाईकोर्ट ने स्थापित कानूनी नजीरों का हवाला देते हुए माना कि आपराधिक मामले में पति और उसके परिजनों का बरी होना और उस फैसले का अपील में भी बरकरार रहना मानसिक क्रूरता का वैध और पुख्ता सबूत है। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि पत्नी के विरोधाभासी बयानों और आपराधिक मामले से बरी होने के घटनाक्रम ने पति के तलाक के दावे को पूरी तरह पुष्ट कर दिया।

