इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को दी अग्रिम जमानत; एफआईआर में देरी और बयानों में विरोधाभास को माना आधार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यौन शोषण के आरोपों से घिरे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जगतगुरु शंकराचार्य ज्योतिषपीठाधीश्वर और स्वामी प्रत्यक्षचैतन्य मुकुंदानंद गिरि की अग्रिम जमानत अर्जी मंजूर कर ली है। न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि एफआईआर दर्ज कराने में हुई देरी और पीड़ितों के बयानों में आए महत्वपूर्ण बदलावों को देखते हुए आवेदकों को गिरफ्तारी से पूर्व राहत दी जानी चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला (केस क्राइम नंबर 58/2026) प्रयागराज के थाना झूंसी में बी.एन.एस. की धारा 351(3) और पॉक्सो एक्ट की विभिन्न धाराओं (3, 4(2), 5(1), 6, 16 और 17) के तहत दर्ज किया गया था। यह एफआईआर प्रथम सूचनाकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी द्वारा बीएनएसएस की धारा 173(4) के तहत दिए गए प्रार्थना पत्र पर विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो), प्रयागराज के आदेश के बाद दर्ज हुई थी। आरोपों के अनुसार, 2025 के महाकुंभ और 2026 के माघ मेले के दौरान दो नाबालिग लड़कों के साथ यौन उत्पीड़न किया गया था।

पक्षों की दलीलें

आवेदकों की ओर से: आवेदकों के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री दिलीप कुमार ने दलील दी कि यह पूरा मामला झूठा और दुर्भावनापूर्ण है। उन्होंने अदालत को बताया कि कथित पीड़ित हरदोई के एक स्कूल के नियमित छात्र हैं और वे कभी भी स्वामी जी के आश्रम में नहीं रहे। बचाव पक्ष ने एफआईआर में देरी पर सवाल उठाते हुए कहा कि सूचनाकर्ता ने 18 जनवरी 2026 को घटना की जानकारी होने का दावा किया, लेकिन 21 जनवरी को पुलिस को दी गई एक अन्य शिकायत में इस घटना का कोई उल्लेख नहीं किया।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, “आवेदक नंबर 1, जो एक सम्मानित गुरु हैं, के खिलाफ लगाए गए आरोप उन्हें अपमानित करने और जनता के बीच उनकी छवि खराब करने के इरादे से लगाए गए हैं।”

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राज्य सरकार और सूचनाकर्ता का विरोध: अपर महाधिवक्ता (AAG) श्री मनीष गोयल ने जमानत का कड़ा विरोध करते हुए इसे जघन्य अपराध बताया। उन्होंने प्रारंभिक आपत्ति जताई कि आवेदकों ने सीधे हाईकोर्ट का रुख किया है, जबकि उन्हें पहले सत्र न्यायालय जाना चाहिए था। सूचनाकर्ता की वकील सुश्री रीना एन. सिंह ने दलील दी कि आरोपियों की प्रभावशाली स्थिति को देखते हुए हिरासत में पूछताछ जरूरी है और पॉक्सो एक्ट की धारा 29 के तहत आरोपियों के खिलाफ अपराध की पूर्वधारणा (presumption of guilt) लागू होती है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

क्षेत्राधिकार पर: कोर्ट ने सीधे हाईकोर्ट आने की चुनौती को खारिज करते हुए कहा कि चूँकि एफआईआर एक विशेष न्यायाधीश (जो सत्र न्यायाधीश के रैंक के होते हैं) के आदेश पर दर्ज हुई थी, इसलिए यह मामला “विशेष परिस्थितियों” के दायरे में आता है और सीधे हाईकोर्ट में अर्जी स्वीकार्य है।

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साक्ष्यों और तथ्यों पर: न्यायमूर्ति सिन्हा ने मामले के तथ्यों की बारीकी से जांच की और निम्नलिखित मुख्य टिप्पणियां कीं:

  1. एफआईआर में देरी: कोर्ट ने पाया कि सूचना मिलने के बाद भी सूचनाकर्ता ने 6 दिनों तक पुलिस को जानकारी नहीं दी। सूचनाकर्ता का यह कहना कि वह ‘पूजा-यज्ञ’ में व्यस्त था, कोर्ट ने पर्याप्त नहीं माना, विशेषकर तब जब उसी दौरान उसने एक अन्य शिकायत पुलिस में दर्ज कराई थी।
  2. बयानों में विसंगति: एफआईआर में घटना का समय जनवरी 2025 से फरवरी 2026 बताया गया था, लेकिन बाद में बयानों में जून 2024 की घटनाओं का भी जिक्र किया गया।
  3. उम्र का अंतर: शैक्षिक प्रमाणपत्रों के अनुसार, एक पीड़ित एफआईआर में वर्णित घटना के समय बालिग हो चुका था।
  4. मेडिकल रिपोर्ट: कोर्ट ने गौर किया कि “पीड़ितों के शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं पाई गई” और डॉक्टर की राय कि ‘यौन हिंसा से इनकार नहीं किया जा सकता’, किसी ठोस आधार पर आधारित नहीं थी।
  5. असामान्य आचरण: कोर्ट ने इसे मानवीय व्यवहार के विपरीत पाया कि पीड़ितों ने अपने प्राकृतिक अभिभावकों के बजाय एक अनजान व्यक्ति (सूचनाकर्ता) को घटना की जानकारी दी।

पॉक्सो एक्ट की धारा 29 पर: अदालत ने स्पष्ट किया कि पॉक्सो एक्ट की धारा 29 के तहत अपराध की पूर्वधारणा का सिद्धांत जमानत के चरण में लागू नहीं होता। हाईकोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा:

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“पॉक्सो एक्ट की धारा 29 के तहत पूर्वधारणा को कम से कम सत्र न्यायालय द्वारा आरोप (charge) तय किए जाने से पहले लागू नहीं किया जा सकता।”

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने उपरोक्त तथ्यों के आधार पर आवेदकों को अग्रिम जमानत प्रदान की। अदालत ने निर्देश दिया कि गिरफ्तारी की स्थिति में आवेदकों को 50,000 रुपये के निजी मुचलके और दो प्रतिभूतियों पर रिहा किया जाए।

कोर्ट ने जमानत के साथ निम्नलिखित शर्तें भी लगाईं:

  • आवेदक गवाहों को प्रभावित नहीं करेंगे और न ही साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करेंगे।
  • आवेदक बिना अनुमति देश नहीं छोड़ेंगे।
  • मीडिया पर रोक: “आवेदकों, पीड़ितों और सूचनाकर्ता को निर्देश दिया जाता है कि वे जांच/ट्रायल लंबित रहने तक इस मामले के संबंध में मीडिया को कोई इंटरव्यू न दें।”

मामले का विवरण:

  • केस का शीर्षक: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जगतगुरु शंकराचार्य ज्योतिषपीठाधीश्वर व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 5 अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल मिस. एंटीसिपेटरी बेल एप्लीकेशन U/S 482 BNSS नंबर 2198/2026
  • पीठ: न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा
  • आदेश की तिथि: 25 मार्च, 2026

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