सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को जीवन रक्षक कैंसर रोधी दवा Nivolumab की सस्ती बायोसिमिलर संस्करण बेचने वाली Zydus Lifesciences को रोकने से इनकार कर दिया। यह दवा मूल रूप से अमेरिकी फार्मा कंपनी Bristol Myers Squibb (BMS) द्वारा पेटेंट कराई गई है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्य बागची की पीठ ने BMS की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि कंपनी पहले Zydus के उत्पाद की प्रत्यक्ष तुलना (Direct Mapping) करे और उसके आधार पर अंतरिम राहत के लिए उच्च न्यायालय का रुख करे। कोर्ट ने Zydus को निर्देश दिया कि वह 24 घंटे के भीतर अपने उत्पाद का सैंपल BMS को उपलब्ध कराए।
“आपको तो किसी भी समय क्षतिपूर्ति मिल सकती है, लेकिन जिन्हें यह दवा चाहिए, उन्हें आपकी दवा नहीं मिल सकेगी,” अदालत ने BMS के वकील से कहा।
इस मामले की पृष्ठभूमि में दिल्ली हाईकोर्ट का वह आदेश है जिसमें 12 जनवरी 2026 को Zydus को घरेलू बाजार में अपनी बायोसिमिलर दवा बेचने की अनुमति दी गई थी। इससे पहले जुलाई 2025 में एकल पीठ ने पेटेंट उल्लंघन के आधार पर Zydus को अस्थायी रूप से रोक दिया था।
Zydus की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि कंपनी की दवा ₹30,000 प्रति वायल में उपलब्ध है, जबकि BMS की मूल दवा ₹1,08,000 प्रति वायल में मिलती है। “एक कैंसर मरीज को औसतन 12 डोज़ की जरूरत होती है। मैं भारत का तीसरा सबसे बड़ा जेनरिक दवा निर्माता हूं,” वकील ने अदालत से कहा।
उन्होंने यह भी पूछा, “अगर यह आदेश डेढ़ साल तक लागू रहा, तो अब जब पेटेंट समाप्ति में केवल चार महीने बाकी हैं, तो इसे क्यों रोका जाए?”
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हाईकोर्ट के उस जनहित आधारित रुख को बरकरार रखता है जिसमें कहा गया था कि इतने कम समय के लिए दवा की उपलब्धता पर रोक लगाना मरीजों के लिए अत्यंत हानिकारक हो सकता है। हाईकोर्ट ने यह भी माना था कि बचे हुए चार महीनों में दवा की उपलब्धता से दोनों पक्षों के हितों में संतुलन बना रहेगा और ज़रूरतमंद मरीजों को राहत मिलेगी।

