भारतीय सशस्त्र बलों में लैंगिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को निर्देश दिया कि सेना, नौसेना और वायु सेना की उन महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) अधिकारियों को पूर्ण पेंशन लाभ दिया जाए, जिन्हें ‘मनमाने मूल्यांकन’ के कारण स्थायी कमीशन (PC) से वंचित कर दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन अधिकारियों को पेंशन के लिए आवश्यक 20 वर्ष की न्यूनतम सेवा पूरी करने वाला ‘माना’ (Deemed) जाएगा, भले ही उन्हें इससे पहले ही सेवामुक्त कर दिया गया हो।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह निर्णय सुनाया। यह फैसला विंग कमांडर सुचेता एदन और अन्य द्वारा दायर याचिकाओं पर आया है, जिसमें 2019 के नीतिगत बदलावों के आधार पर स्थायी कमीशन न दिए जाने को चुनौती दी गई थी।
कोर्ट ने अपने फैसले में महिला अधिकारियों के मूल्यांकन के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए। चीफ जस्टिस ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि महिला अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) अक्सर बेहद ‘लापरवाह’ तरीके से तैयार की गई थी।
अदालत ने टिप्पणी की, “ACR इस धारणा के साथ लिखी गई थीं कि ये महिलाएं आगे करियर में प्रगति या स्थायी कमीशन के लिए पात्र नहीं होंगी। इस सोच ने उनकी समग्र योग्यता (Merit) को बुरी तरह प्रभावित किया।” पीठ ने पाया कि इस संस्थागत पूर्वाग्रह ने महिला अधिकारियों के करियर की राह में तब ही बाधाएं डाल दी थीं, जब उन्हें स्थायी भूमिकाओं के लिए विचाराधीन भी नहीं लिया गया था।
कोर्ट ने सेना के तीनों अंगों में मूल्यांकन मॉडल की विस्तार से समीक्षा की:
- वायु सेना: पीठ ने पाया कि 2019 में लागू ‘सर्विस लेंथ क्राइटेरिया’ और ‘मिनिमम परफॉर्मेंस क्राइटेरिया’ इतनी जल्दबाजी में लागू किए गए कि अधिकारियों को इन मानकों पर खरा उतरने का उचित अवसर ही नहीं मिला।
- थल सेना और नौसेना: इन सेवाओं के मूल्यांकन मॉडल में भी समान कमियां पाई गईं। कोर्ट ने नोट किया कि मूल्यांकन के मानदंडों को स्पष्ट रूप से साझा न करने के कारण अधिकारियों के स्थायी कमीशन प्राप्त करने की संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
हालांकि, अदालत ने ‘ऑपरेशनल इफेक्टिवनेस’ (परिचालन प्रभावशीलता) का हवाला देते हुए इन अधिकारियों की बहाली (Reinstatement) का आदेश देने से इनकार कर दिया। लेकिन पीठ ने यह भी साफ कर दिया कि ऑपरेशनल जरूरतों को किसी भी अधिकारी को उनके वित्तीय लाभों से वंचित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
एकमुश्त उपाय के रूप में, हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि 2019, 2020 और 2021 के चयन बोर्डों में स्थायी कमीशन के लिए विचार की गई सभी SSC महिला अधिकारी—जिनमें 2021 में सेवामुक्त हुई अधिकारी भी शामिल हैं—20 वर्ष की सेवा पूरी करने वाली मानी जाएंगी।
इन अधिकारियों की पेंशन इसी 20 वर्ष की ‘डीम्ड’ सेवा के आधार पर तय की जाएगी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह पेंशन लाभ 1 नवंबर, 2025 से प्रभावी होगा। हालांकि, सक्रिय सेवा में नहीं रहने वाले अधिकारियों के लिए विंग कमांडर के पद पर ‘नॉमिनल टाइम-स्केल प्रमोशन’ की मांग को कोर्ट ने खारिज कर दिया।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपनी मौजूदा नीतियों का बचाव किया। सरकार की ओर से दलील दी गई कि सेना की प्रक्रियाएं पूरी तरह से ‘जेंडर-न्यूट्रल’ (लिंग-तटस्थ) हैं और अधिकारियों की छंटनी बलों को ‘युवा’ बनाए रखने की नीति का हिस्सा है।
सरकार की इन दलीलों के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन महिला अधिकारियों के लिए एक बड़ा सुधार माना जा रहा है जिन्होंने वर्षों तक देश की रक्षा में योगदान दिया लेकिन ‘मनमाने’ प्रशासनिक नियमों के कारण लाभों से वंचित रहीं। मामले का विस्तृत लिखित निर्णय जल्द ही जारी होने की उम्मीद है।

