सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के एक मामले में आरोपी को मिली जमानत को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी की जमानत अर्जी को शुरुआत में ही खारिज करने और एक बार मिल चुकी जमानत को रद्द करने के लिए अलग-अलग पैमानों (Parameters) का इस्तेमाल होता है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें आरोपी रिंकू भारद्वाज उर्फ प्रकाश राजभर को जमानत दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि जमानत रद्द करने के लिए “बहुत ही ठोस और प्रबल परिस्थितियों” (Very cogent and overwhelming circumstances) का होना अनिवार्य है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के चोपन पुलिस स्टेशन में दर्ज 2018 की एक एफआईआर (संख्या 238/2018) से जुड़ा है। घटना 25 अक्टूबर 2018 की सुबह करीब 6 बजे की है, जब मृतक अपनी डेली एक्सरसाइज के लिए गया था। वहां अज्ञात हमलावरों ने उसकी गोली मारकर हत्या कर दी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, अस्पताल ले जाते समय मृतक ने बयान दिया था कि उस पर राकेश जायसवाल और रवि जालान ने अन्य लोगों के साथ मिलकर हमला किया है। मजे की बात यह है कि प्रतिवादी संख्या 2 (रिंकू भारद्वाज) का नाम एफआईआर में नहीं था। उसका नाम बाद में एक अन्य आरोपी कश्मीर पासवान के बयान और गवाहों की डायरी में दर्ज बयानों (Oral dying declaration references) के आधार पर सामने आया। पुलिस ने उसे 27 दिसंबर 2018 को गिरफ्तार किया था।
सुप्रीम कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
याचिकाकर्ता उस्मान अली की ओर से दलील दी गई कि रिंकू भारद्वाज एक खूंखार अपराधी है और उसका स्थानीय स्तर पर काफी प्रभाव है। आरोप लगाया गया कि उसने भाड़े के हत्यारों के जरिए पंचायत अध्यक्ष की दिनदहाड़े हत्या करवाई। वकील ने कहा कि आरोपी घटना के बाद फरार हो गया था और उसे यूपी एसटीएफ और कोलकाता एटीएस के संयुक्त अभियान के बाद ही पकड़ा जा सका। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि आरोपी का लंबा आपराधिक इतिहास है और हाईकोर्ट ने जमानत देते समय इसे नजरअंदाज कर दिया, जिससे गवाहों की जान को खतरा है।
वहीं, कोर्ट की सहायता के लिए नियुक्त एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) श्री अभिषेक मोहन गोयल ने इसका विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि यह मामला जमानत मांगने का नहीं, बल्कि मिली हुई जमानत को रद्द करवाने का है। उन्होंने कहा कि कानून के मुताबिक, जमानत तभी रद्द की जा सकती है जब कोई असाधारण परिस्थिति हो। इस मामले में ऐसे कोई हालात नहीं हैं।
कोर्ट की अहम टिप्पणी: ‘जमानत रद्द करना आसान नहीं’
सुप्रीम कोर्ट ने ‘दौलत राम बनाम हरियाणा राज्य (1995)’ और ‘महिपाल बनाम राजेश कुमार (2020)’ के फैसलों का हवाला देते हुए स्थिति स्पष्ट की।
पीठ ने कहा कि गैर-जमानती अपराध में शुरुआत में जमानत देने से इनकार करना एक अलग बात है, लेकिन एक बार जमानत मिल जाने के बाद उसे रद्द करना बिल्कुल अलग बात है। कोर्ट ने बताया कि जमानत रद्द करने के लिए निम्नलिखित आधार होने चाहिए:
- न्याय प्रक्रिया में बाधा डालना या प्रयास करना।
- कानून की पकड़ से भागने की कोशिश करना।
- मिली हुई स्वतंत्रता (Liberty) का दुरुपयोग करना।
- आरोपी के फरार होने की संभावना।
कोर्ट ने कहा, “एक बार दी गई जमानत को यंत्रवत (Mechanically) तरीके से रद्द नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि ऐसी कोई नई परिस्थितियां न हों जो यह दर्शाती हों कि आरोपी का बाहर रहना निष्पक्ष सुनवाई के लिए खतरा है।”
फैसला: 6.5 साल की जेल और कोई दुरुपयोग नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि रिंकू भारद्वाज का नाम एफआईआर में नहीं था और उसे बाद में बयानों के आधार पर आरोपी बनाया गया। जब हाईकोर्ट ने उसे जमानत दी थी, तब तक वह करीब साढ़े छह साल जेल में बिता चुका था।
कोर्ट ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 22 जनवरी 2025 को जमानत का आदेश दिया था और अब एक साल से ज्यादा समय बीत चुका है। इस दौरान ऐसा कोई आरोप नहीं लगा है कि आरोपी ने अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया है।
इन तथ्यों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने का कोई कारण नहीं है और अपील को खारिज कर दिया।
केस डीटेल्स
- केस का नाम: उस्मान अली बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील संख्या 541 ऑफ 2026 (अराइजिंग आउट ऑफ एस.एल.पी. (क्रिमिनल) नंबर 4713 ऑफ 2025)
- कोरम : जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा

