2021 नोएडा हमले में घृणा अपराध की धाराएं न लगाने पर सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार से पूछा सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा है कि नोएडा में 2021 में हुए एक कथित घृणा अपराध के मामले में भारतीय दंड संहिता की उचित धाराएं क्यों नहीं लगाई गईं। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि उसे उसकी धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाया गया, लेकिन पुलिस ने धारा 153-बी, 295-ए और 298 जैसी गंभीर धाराएं FIR में नहीं जोड़ीं। कोर्ट ने मामले में राज्य सरकार से एक सप्ताह में जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश सरकार से उस कारण पर जवाब मांगा कि नोएडा में 2021 में हुए कथित घृणा अपराध के मामले में एफआईआर दर्ज करते समय भारतीय दंड संहिता की उपयुक्त धाराएं क्यों नहीं लगाई गईं।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ वरिष्ठ नागरिक याचिकाकर्ता की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि 4 जुलाई 2021 को नोएडा में उनकी दाढ़ी और धार्मिक पहचान को लेकर कुछ लोगों ने उनके साथ अभद्रता, मारपीट और अपमानजनक व्यवहार किया।

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने अदालत को बताया कि संबंधित जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर दी गई है। लेकिन पीठ इस उत्तर से संतुष्ट नहीं हुई।

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“क्या इससे यह समस्या हल हो जाती है कि उपयुक्त धाराओं में मुकदमा दर्ज ही नहीं हुआ?” – कोर्ट ने सवाल उठाया।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हुज़ेफा अहमदी ने तर्क दिया कि एफआईआर में आईपीसी की धारा 153-बी (राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक वक्तव्य), 295-ए (धार्मिक भावनाएं आहत करने के उद्देश्य से जानबूझकर किए गए कृत्य) और 298 (धार्मिक भावनाएं आहत करने के इरादे से शब्दों का प्रयोग) को शामिल किया जाना चाहिए था।

उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में राज्य द्वारा उचित धाराएं न लगाने की एक “रुझानात्मक झिझक” दिखाई देती है।

“मैं एक पैटर्न दिखा रहा हूं, जिसमें राज्य के अधिकारी यह मानने को तैयार नहीं कि यह घृणा अपराध है,” – अहमदी ने कहा।

हालांकि कोर्ट ने कहा कि इसे व्यापक राजनीतिक रंग देने की आवश्यकता नहीं है।

“इस मामले को ऐसा रंग न दें। यह एक व्यक्तिगत घटना है, जिसके लिए आप इस न्यायालय में आए हैं। हमने आपकी याचिका स्वीकार की है और हमें राज्य सरकार से कार्रवाई की उम्मीद है,” – पीठ ने कहा।

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जब नटराज ने दोहराया कि जांच अधिकारी के खिलाफ जांच शुरू कर दी गई है, तो कोर्ट ने तीखी टिप्पणी की:

“सिर्फ जांच शुरू कर देना यह सवाल हल नहीं करता कि उपयुक्त धाराओं में मुकदमा क्यों दर्ज नहीं हुआ।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक सही धाराओं में मामला दर्ज नहीं होगा और जांच नहीं होगी कि वे अपराध सिद्ध होते हैं या नहीं, तब तक निष्पक्ष विवेचना संभव नहीं है।

“जब तक उपयुक्त धाराओं में केस दर्ज नहीं होगा और जांच नहीं होगी, तब तक आप कैसे कह सकते हैं कि यह अपराध बनता है या नहीं?” – कोर्ट ने पूछा।

नटराज ने जवाब दिया कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपपत्र दाखिल किया गया है। लेकिन कोर्ट ने कहा:

“थोड़े वस्तुनिष्ठ बनिए। मंजूरी न देना एक अलग बात है, लेकिन एफआईआर दर्ज करने से ही इनकार कर देना क्या उचित है?”

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जब राज्य की ओर से यह स्वीकार किया गया कि उचित धाराएं लगनी चाहिए थीं, तो पीठ ने कहा: “तो फिर अभी निर्देश दीजिए।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह के मामलों में धारा 196 सीआरपीसी (राज्य के विरुद्ध अपराधों के लिए अभियोजन की अनुमति) लागू हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि एफआईआर दर्ज ही न हो।

पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह मामले में स्पष्ट निर्देश लेने के लिए एक सप्ताह का समय ले सकती है। अगली सुनवाई 13 फरवरी को होगी।

याचिका में यह भी मांग की गई है कि गौतम बुद्ध नगर जिले के कुछ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्णयों में बताए गए निवारक और उपचारात्मक उपायों का पालन न करने को लेकर विभागीय या दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

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