सुप्रीम कोर्ट ने पति द्वारा दायर ‘दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना’ के मामले को राजस्थान ट्रांसफर किया, पत्नी की आय न होने को आधार माना

सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी द्वारा दायर एक स्थानांतरण याचिका (Transfer Petition) को स्वीकार करते हुए पति द्वारा दायर ‘दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना’ (Restitution of Conjugal Rights) के मामले को उज्जैन, मध्य प्रदेश से भीलवाड़ा, राजस्थान स्थानांतरित करने का आदेश दिया है। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने यह माना कि याचिकाकर्ता पत्नी के पास आय का कोई स्वतंत्र साधन नहीं है और वह स्थायी रूप से अपने मायके में रह रही है।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कानूनी सवाल यह था कि क्या हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत पति द्वारा उज्जैन में शुरू की गई कार्यवाही को भीलवाड़ा स्थानांतरित किया जाना चाहिए, जहां पत्नी वर्तमान में निवास कर रही है। अदालत ने पत्नी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए यात्रा करने के लिए उसके पास वित्तीय सहायता की कमी और उसके गृह जिले में अन्य मुकदमों के लंबित होने पर जोर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, हनी ने केस नंबर RCS/HM/0000067 वर्ष 2025 (योगेश बनाम श्रीमती हनी) को ट्रांसफर करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। यह मामला प्रतिवादी-पति, योगेश द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत दांपत्य अधिकारों की बहाली के लिए अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, जिला न्यायालय, उज्जैन, मध्य प्रदेश के समक्ष दायर किया गया था।

याचिकाकर्ता ने उज्जैन में मामले को प्रभावी ढंग से लड़ने में अपनी असमर्थता का हवाला देते हुए मामले को फैमिली कोर्ट, भीलवाड़ा, राजस्थान में स्थानांतरित करने की मांग की थी।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता-पत्नी के विद्वान वकील ने दलील दी कि वह स्थायी रूप से भीलवाड़ा, राजस्थान में अपने माता-पिता के घर पर रह रही है। स्थानांतरण के अनुरोध का मुख्य आधार आर्थिक कठिनाई थी। यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता के पास “आय का कोई स्वतंत्र साधन नहीं है और न ही उज्जैन की यात्रा करने के लिए कोई सहारा है ताकि वह प्रतिवादी द्वारा शुरू की गई कार्यवाही में भाग ले सके, और वह पूरी तरह से अपने परिवार पर निर्भर है।”

इसके अलावा, वकील ने इस बात पर प्रकाश डाला कि पार्टियों के बीच भीलवाड़ा, राजस्थान में पहले से ही चार अन्य मामले लंबित हैं।

प्रतिवादी-पति याचिका का विरोध करने के लिए अदालत के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ। अदालत ने नोट किया, “हालांकि प्रतिवादी को नोटिस की तामील पूरी हो चुकी है, लेकिन उसकी ओर से कोई भी उपस्थित नहीं हुआ है।”

कोर्ट का विश्लेषण

याचिकाकर्ता के वकील को सुनने के बाद, पीठ ने याचिका में दम पाया। कोर्ट ने पत्नी के निवास और वित्तीय निर्भरता के संबंध में उसके तर्क को स्वीकार कर लिया।

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अपने आदेश में, पीठ ने कहा:

“हमारी राय में, प्रतिवादी-पति द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत दायर याचिका को स्थानांतरित करने का मामला बनता है, क्योंकि याचिकाकर्ता-पत्नी का दावा है कि वह स्थायी रूप से भीलवाड़ा, राजस्थान में अपने मायके में रह रही है, उसके पास आय का कोई स्वतंत्र साधन नहीं है या प्रतिवादी द्वारा शुरू की गई कार्यवाही में भाग लेने के लिए उज्जैन की यात्रा करने के लिए कोई सहारा नहीं है और वह पूरी तरह से अपने परिवार पर निर्भर है।”

अदालत ने कई मुकदमों के संबंध में पार्टियों की सुविधा पर भी विचार किया और नोट किया कि “भीलवाड़ा, राजस्थान में चार और मामले लंबित हैं।”

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसफर पिटीशन (सिविल) संख्या 2666 वर्ष 2025 को अनुमति दे दी। कोर्ट ने आदेश दिया कि उज्जैन फैमिली कोर्ट में लंबित केस नंबर RCS/HM/0000067 वर्ष 2025 को फैमिली कोर्ट, भीलवाड़ा, राजस्थान में स्थानांतरित किया जाए।

अदालत ने आगे निर्देश दिया कि ट्रांसफरी कोर्ट (जिस कोर्ट में केस भेजा गया है) या तो मामले की सुनवाई खुद करे या इसे सक्षम क्षेत्राधिकार वाले किसी अन्य कोर्ट को सौंप दे। यह भी अनिवार्य किया गया कि रिकॉर्ड तुरंत ट्रांसफरी कोर्ट को भेजे जाएं।

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इसके अतिरिक्त, पीठ ने जहां संभव हो वहां तकनीक के माध्यम से कार्यवाही को सुविधाजनक बनाने के लिए निर्देश जारी किए:

“यदि ट्रांसफरी कोर्ट में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधाएं उपलब्ध हैं, तो पार्टियों को सुनवाई की उन तारीखों पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित होने की अनुमति दी जा सकती है जिन पर कोई प्रभावी कार्यवाही (non-effective dates) नहीं होनी है।”

अदालत ने पार्टियों पर बोझ कम करने के लिए प्रशासनिक दक्षता का भी सुझाव दिया:

“जहां भी संभव हो, मामलों को एक ही अदालत को सौंपा जा सकता है और इन मामलों को एक ही दिन तय करने का प्रयास किया जा सकता है ताकि पार्टियों को कई तारीखों पर अदालत में उपस्थित न होना पड़े।”

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: हनी बनाम योगेश
  • केस नंबर: ट्रांसफर पिटीशन (सिविल) संख्या 2666/2025
  • कोरम: जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री ऋषि टूटू (अधिवक्ता), श्री अमन झा (एओआर), श्री क्षितिज मयंक (अधिवक्ता), श्री सृजन साहू (अधिवक्ता)
  • प्रतिवादी के वकील: सुश्री सृष्टि मिश्रा (एओआर), श्री सुमीत मिश्रा (अधिवक्ता)

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