सुप्रीम कोर्ट ने सच्चिदानंद सिन्हा लाइब्रेरी के अधिग्रहण वाले बिहार सरकार के कानून को किया रद्द, ‘स्पष्ट मनमानी’ को बताया आधार

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में बिहार सरकार द्वारा बनाए गए ‘श्रीमती राधिका सिन्हा संस्थान और सच्चिदानंद सिन्हा पुस्तकालय (अधिग्रहण और प्रबंधन) अधिनियम, 2015’ को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। न्यायालय ने सदी पुराने इस प्रतिष्ठित संस्थान को सरकारी नियंत्रण में लेने की राज्य सरकार की कोशिश को खारिज करते हुए ट्रस्ट के प्रबंधन अधिकारों को बहाल करने का निर्देश दिया है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने 10 मार्च, 2026 को दिए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि उक्त अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 300A का उल्लंघन करता है और यह विधायी शक्ति का ‘स्पष्ट रूप से मनमाना’ (Manifestly Arbitrary) प्रयोग है।

मामले की पृष्ठभूमि

श्रीमती राधिका सिन्हा संस्थान और सच्चिदानंद सिन्हा पुस्तकालय की स्थापना वर्ष 1924 में संविधान सभा के अंतरिम अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा द्वारा अपनी पत्नी की स्मृति में की गई थी। इसके लिए उन्होंने अपनी पैतृक संपत्ति बेचकर राशि जुटाई थी। 1926 के ट्रस्ट डीड के अनुसार, परिवार का सबसे बड़ा पुरुष सदस्य इसका मानद सचिव और मुख्य कार्यकारी अधिकारी होगा।

1955 में राज्य सरकार के साथ एक समझौते के तहत इसे ‘राज्य केंद्रीय पुस्तकालय’ का दर्जा दिया गया, लेकिन प्रबंधन का अधिकार ट्रस्ट के पास ही रहा। 1983 में भी राज्य सरकार ने अध्यादेशों के जरिए इसे अधिग्रहित करने की कोशिश की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में विफल कर दिया था। इसके तीन दशक बाद, बिहार सरकार ने ‘बेहतर प्रबंधन’ के नाम पर 2015 का अधिनियम पारित किया। डॉ. सिन्हा के प्रपौत्र अनुराग कृष्ण सिन्हा ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन हाईकोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता: वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील कुमार ने तर्क दिया कि यह संस्थान एक निजी ट्रस्ट द्वारा संचालित है और इंडियन ट्रस्ट्स एक्ट, 1882 के क्षेत्र में आता है। उन्होंने अधिनियम को ‘जब्त करने वाला’ (Confiscatory) बताते हुए कहा कि मुआवजे के रूप में केवल ‘अधिकतम एक रुपया’ देने का प्रावधान अनुच्छेद 300A का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि अधिग्रहण के लिए कुप्रबंधन का कोई ठोस आरोप या सबूत नहीं दिया गया।

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बिहार राज्य: वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार ने दलील दी कि यह एक सार्वजनिक ट्रस्ट (Public Trust) है और इस पर इंडियन ट्रस्ट्स एक्ट लागू नहीं होता। उन्होंने कहा कि पुस्तकालय की विरासत के बेहतर विकास और संरक्षण के लिए अधिग्रहण जरूरी था। राज्य ने यह भी बताया कि अधिग्रहण के बाद बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 72 करोड़ रुपये से अधिक की राशि स्वीकृत की गई है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष को त्रुटिपूर्ण माना जिसमें संस्थान को ‘सार्वजनिक ट्रस्ट’ कहा गया था। पीठ ने कहा कि किसी ट्रस्ट का कानूनी स्वरूप उसकी डीड और संरचना पर निर्भर करता है। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि भले ही इसे सार्वजनिक माना जाए, फिर भी अधिनियम को अनुच्छेद 14 की कसौटी पर खरा उतरना होगा।

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स्पष्ट मनमानी (Manifest Arbitrariness) पर: न्यायालय ने शायरा बानो बनाम भारत संघ और अजय हसिया बनाम खालिद मुजीब जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा कि विधायी कार्रवाई में स्पष्ट मनमानी उसे रद्द करने का आधार है। पीठ ने टिप्पणी की:

“इन प्रावधानों का संचयी प्रभाव नियामक पर्यवेक्षण नहीं, बल्कि उस कानूनी और संस्थागत ढांचे का पूर्ण विस्थापन है जिसने लगभग एक शताब्दी तक इस संस्थान का संचालन किया है।”

न्यायालय ने पाया कि रिकॉर्ड में एक भी ऐसा पत्र नहीं है जिसमें राज्य ने अधिग्रहण से पहले ट्रस्ट को कुप्रबंधन या वित्तीय अनियमितता के बारे में सूचित किया हो। पीठ ने यह भी कहा कि चूंकि ‘स्टेट लाइब्रेरियन’ ही पदेन मुख्य पुस्तकालयाध्यक्ष था, इसलिए राज्य कुप्रबंधन का दोष ट्रस्ट पर नहीं मढ़ सकता जब उसने अपने ही अधिकारी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।

आनुपातिकता और मुआवजे पर: पीठ ने माना कि निवेश और विकास का लक्ष्य अधिग्रहण के बिना भी ‘कम सख्त उपायों’ जैसे अनुदान या ऑडिट के जरिए हासिल किया जा सकता था।

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“यह तथ्य कि विधायिका ने सबसे चरम उपाय चुना, जबकि कम आक्रामक विकल्प मौजूद थे, स्वयं उस मनमानी का प्रमाण है जो इस अधिनियम में दिखाई देती है।”

धारा 7 के तहत एक रुपये के मुआवजे के प्रावधान पर कोर्ट ने कहा:

“एक ऐसा वैधानिक प्रावधान जो संपत्ति के अधिग्रहण की अनुमति देता है लेकिन मुआवजे को केवल प्रतीकात्मक (Token amount) बना देता है, उसमें निष्पक्षता के बुनियादी गुणों का अभाव है।”

न्यायालय का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए 2015 के अधिनियम को असंवैधानिक घोषित किया। न्यायालय ने निम्नलिखित आदेश दिए:

  1. 2015 के अधिनियम को रद्द किया जाता है।
  2. संस्थान के प्रबंधन और प्रशासन के अधिकार ट्रस्ट को उसी स्थिति में वापस दिए जाते हैं जो अधिनियम से पहले थी।
  3. राज्य सरकार कानून के दायरे में वित्तीय सहायता या नियामक निगरानी प्रदान करने के लिए स्वतंत्र है।
  • केस का नाम: अनुराग कृष्ण सिन्हा बनाम बिहार राज्य और अन्य
  • सिविल अपील संख्या: 2025 की 13581

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