सुप्रीम कोर्ट ने 1,000 करोड़ रुपये के मुंबई स्लम पुनर्विकास विवाद में ‘यथास्थिति’ (Status Quo) का आदेश दिया, NCLT को जल्द सुनवाई का निर्देश

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 1,000 करोड़ रुपये के मुंबई स्लम पुनर्विकास प्रोजेक्ट से जुड़े एक बड़े कॉर्पोरेट विवाद में नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के आदेश को संशोधित करते हुए सभी पक्षों को यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब तक नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT), मुंबई बेंच के समक्ष उत्पीड़न और कुप्रबंधन (oppression and mismanagement) से जुड़ी मुख्य याचिका लंबित है, तब तक संपत्ति की प्रकृति में कोई बदलाव या तीसरे पक्ष के अधिकार (third-party interests) उत्पन्न करने वाला कोई कदम नहीं उठाया जाएगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद शाजस डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड (प्रतिवादी संख्या 1) और उसकी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी जेएलएस रियल्टी प्राइवेट लिमिटेड (प्रतिवादी संख्या 2) के नियंत्रण और शेयरधारिता से उत्पन्न हुआ है। जेएलएस रियल्टी मुंबई के जोगेश्वरी (पूर्व) स्थित शंकरवाड़ी में लगभग 21,727 वर्ग मीटर जमीन पर एक स्लम पुनर्विकास परियोजना चला रही है।

अपीलकर्ता मोनिवेदा कंसल्टेंट्स एलएलपी ने शाजस डेवलपर्स में 40% हिस्सेदारी होने का दावा किया है। अपीलकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने मई 2016 में यह हिस्सेदारी हासिल की थी और कर्ज में डूबी इस परियोजना को वापस पटरी पर लाते हुए कई बड़े लोन चुकाए थे। लेकिन 2021 की शुरुआत में उन्हें पता चला कि 1 मार्च 2021 के डिजिटल टाइमस्टैम्प वाले एक संशोधित ‘फॉर्म MGT-7’ के जरिए उनकी 40% हिस्सेदारी को अवैध रूप से हटा दिया गया है।

अपीलकर्ताओं का आरोप है कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 100 का उल्लंघन करते हुए अवैध रूप से नए निदेशक नियुक्त किए गए और संपत्तियों को ठिकाने लगाया जा रहा है। मामले के लंबित रहने के दौरान ही परियोजना की जमीन स्पेंटा सनसिटी प्राइवेट लिमिटेड (जो अब दिवालिया प्रक्रिया से गुजर रही है) को हस्तांतरित कर दी गई और 525 करोड़ रुपये के ऋण के लिए गिरवी रख दी गई।

NCLT ने 29 जुलाई 2021 को मामले में कोई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद NCLAT ने 11 अक्टूबर 2022 को NCLT के आदेश को तो रद्द कर दिया, लेकिन अंतरिम सुरक्षा को ‘अनुभवात्मक कदमों’ (perceptive steps) पर रोक लगाते हुए केवल एक महीने के लिए सीमित कर दिया। इस सीमित राहत से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की दलील थी कि यदि ‘पूर्व स्थिति’ (status quo ante) बहाल नहीं की गई और सार्थक अंतरिम सुरक्षा नहीं दी गई, तो प्रतिवादी कंपनियां मात्र ‘शेल कंपनियों’ में तब्दील हो जाएंगी। मुख्य अपील के साथ-साथ अपीलकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों की अवमानना का आरोप लगाते हुए याचिकाएं भी दायर कीं, जिसमें कहा गया कि अदालत की रोक के बावजूद निर्माण कार्य और संभावित खरीदारों को यूनिट्स की मार्केटिंग की जा रही है।

वहीं दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने अवमानना के इन सभी आरोपों से इनकार किया है।

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कोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने पाया कि मुख्य कंपनी याचिका अभी भी NCLT के समक्ष लंबित है। इसलिए, शीर्ष अदालत का दायरा केवल इस बात तक सीमित था कि मुख्य मामले के निपटारे तक विवादित संपत्ति को सुरक्षित रखने के लिए अंतरिम सुरक्षा की प्रकृति कैसी होनी चाहिए।

कोर्ट ने अपने पूर्व के अंतरिम आदेशों की समीक्षा की, जिनमें दिसंबर 2022 का आदेश, स्पेंटा सनसिटी की दिवालिया प्रक्रिया के कारण जुलाई 2024 में निर्माण पर लगाई गई पूर्ण रोक, और अक्टूबर 2024 का वह आदेश शामिल है जिसमें आस-पास की इमारतों की सुरक्षा के लिए केवल सीमित सुरक्षात्मक कार्यों (जैसे रिटेनिंग वॉल) की अनुमति दी गई थी, लेकिन पुनर्विकास निर्माण की सख्त मनाही थी।

विवादित संपत्ति को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:

“यह देखना पर्याप्त है कि परियोजना की भूमि पक्षों के बीच विवाद से जुड़ी मुख्य संपत्ति है, और NCLT, मुंबई बेंच के समक्ष उत्पीड़न और कुप्रबंधन के आरोपों को उठाने वाली कंपनी याचिका अभी भी लंबित है। ऐसी परिस्थितियों में, सर्वोपरि विचार यह सुनिश्चित करना है कि जब तक सक्षम फोरम विवाद का फैसला नहीं कर लेता, तब तक कार्यवाही की विषय वस्तु सुरक्षित रहे।”

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने NCLAT के 11 अक्टूबर 2022 के आदेश को संशोधित करते हुए यह सुनिश्चित किया कि पूर्व के आदेशों के तहत अंतरिम व्यवस्था जारी रहनी चाहिए।

अदालत ने निर्देश दिया:

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“तदनुसार, यह निर्देशित किया जाता है कि पक्षकार इस न्यायालय द्वारा पारित पूर्व आदेशों के संदर्भ में यथास्थिति बनाए रखेंगे, और ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाएगा जिससे संपत्ति की प्रकृति बदल जाए या उसमें आगे तीसरे पक्ष के हित पैदा हों।”

अदालत ने NCLT, मुंबई बेंच को लंबित मामलों पर जल्द से जल्द आगे बढ़ने का निर्देश दिया। सभी पक्षों को 19 मार्च 2026 को NCLT के समक्ष पेश होने को कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपेक्षा जताई है कि NCLT उपस्थिति की तारीख से दो महीने के भीतर मुख्य याचिका पर प्राथमिकता से फैसला करे। इसके साथ ही, अपील और अवमानना याचिकाओं का निपटारा करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियों को मामले के मेरिट (गुण-दोष) पर कोई राय न माना जाए।

केस विवरण:

  • केस का शीर्षक: मोनिवेदा कंसल्टेंट्स एलएलपी और अन्य बनाम शाजस डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड और अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 9052-9053 (2022) के साथ अवमानना याचिका (C) संख्या 616-617 (2023) और अवमानना याचिका (C) संख्या 641-642 (2025)
  • कोरम (पीठ): जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
  • आदेश की तिथि: 11 मार्च 2026

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