‘एटमाइज्ड’ सोशल मीडिया से ‘फेयर ट्रायल’ को खतरा: सुप्रीम कोर्ट ने जताई गंभीर चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मोबाइल फोन से बनाए गए वीडियो को तुरंत सोशल मीडिया पर अपलोड करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की एक पीठ ने कहा कि इस तरह की गतिविधियां निष्पक्ष सुनवाई (फेयर ट्रायल) के संवैधानिक अधिकार के लिए एक “गंभीर खतरा” पैदा करती हैं।

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमालय बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने टिप्पणी की कि आज के डिजिटल दौर में, जहां “मोबाइल फोन रखने वाला हर व्यक्ति मीडिया बन गया है,” एक ऐसा दूषित माहौल बन रहा है जो कानून के शासन को कमजोर कर सकता है।

यह टिप्पणियां हेमेंद्र पटेल द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान आईं। याचिका में आरोप लगाया गया था कि पुलिस अधिकारी अक्सर आरोपियों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड कर देते हैं, जिससे ट्रायल शुरू होने से पहले ही जनता के मन में उनके प्रति पूर्वाग्रह पैदा हो जाता है।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने पुलिस द्वारा आरोपियों को हथकड़ी लगाकर, रस्सियों से बांधकर, घुमाने या घुटने टेकने पर मजबूर करने वाली तस्वीरें साझा करने के चलन की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने तर्क दिया कि ये कृत्य न केवल व्यक्तिगत गरिमा पर हमला हैं, बल्कि सार्वजनिक पूर्वाग्रह को भी बढ़ावा देते हैं।

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न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि पुलिस को मीडिया ब्रीफिंग के लिए ‘स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर’ (SOP) तैयार करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है, लेकिन सोशल मीडिया का मुद्दा कहीं अधिक व्यापक तंत्र की मांग करता है। उन्होंने कहा, “पुलिस को तो SOP के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन सोशल मीडिया और आम जनता का क्या? क्या उन्हें नियंत्रित किया जा सकता है?” उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि टीवी चैनल फिर भी काफी हद तक संयमित नजर आते हैं।

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सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि जांच एजेंसी को निष्पक्ष रहना चाहिए—न तो पीड़ित के पक्ष में और न ही आरोपी के पक्ष में—ताकि सच्चाई का पता लगाया जा सके।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “पुलिस मैनुअल (SOP) अधिकारियों को उत्साही बयान देने से रोकेगा, जो अक्सर विचाराधीन मामलों में हस्तक्षेप करते हैं।” हालांकि, उन्होंने सवाल उठाया कि उन “तीसरे पक्ष” या सोशल मीडिया के हिस्सों से कैसे निपटा जाए जो अपनी कहानियां गढ़ते हैं और ‘मीडिया ट्रायल’ के जरिए न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। पीठ ने इस संदर्भ में 2012 के ऐतिहासिक सहारा बनाम सेबी मामले का भी जिक्र किया।

सुनवाई के दौरान मीडिया की पहचान के दुरुपयोग का मुद्दा भी उठा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म “ब्लैकमेलर” की तरह काम कर रहे हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने छोटे शहरों में फर्जी मीडिया क्रेडेंशियल का इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति को “डिजिटल अरेस्ट” का एक दूसरा पहलू बताया। उन्होंने कहा कि लोग अपने वाहनों पर मीडिया के स्टिकर लगाकर रौब झाड़ते हैं। वहीं, शंकरनारायणन ने बताया कि कुछ अधिवक्ता टोल टैक्स से बचने के लिए अपनी कारों पर ‘सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट’ के स्टिकर का इस्तेमाल करते हैं।

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अदालत ने माना कि डिजिटल युग में निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए एक “व्यापक दृष्टिकोण” की आवश्यकता है। पीठ ने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता वर्तमान याचिका वापस ले लें और अप्रैल के बाद, जब पुलिस ब्रीफिंग के नए दिशा-निर्देश लागू हो जाएंगे, तो एक बड़े दायरे के साथ नई याचिका दायर करें।

अदालत के सुझाव को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता ने मामले को वापस ले लिया और भविष्य में इसे फिर से दाखिल करने की अनुमति मांगी।

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