वैधानिक उपचार उपलब्ध होने पर हाईकोर्ट अनुच्छेद 226 के तहत पंचायत चुनाव में हस्तक्षेप नहीं कर सकता; सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाई कोर्ट का आदेश रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि जब संविधान के अनुच्छेद 243-O के तहत स्पष्ट रोक हो और एक प्रभावी वैकल्पिक वैधानिक उपचार उपलब्ध हो, तो हाईकोर्ट को अनुच्छेद 226 के तहत अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग करके पंचायत चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने संदीप सिंह बोरा द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा पारित उस अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत एक उम्मीदवार के नामांकन की अस्वीकृति पर रोक लगा दी गई थी और उसे चुनाव चिन्ह आवंटित करने का निर्देश दिया गया था।

शीर्ष अदालत के समक्ष मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या संविधान के अनुच्छेद 243-O के तहत संवैधानिक रोक और उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम, 2016 के तहत चुनाव याचिका (Election Petition) का विकल्प होने के बावजूद, हाईकोर्ट पंचायत चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने के लिए अपने रिट अधिकार क्षेत्र का उपयोग कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इसका उत्तर नकारात्मक में दिया। कोर्ट ने कहा कि “जहां चुनाव याचिका के माध्यम से एक विशिष्ट वैधानिक उपचार उपलब्ध है, वहां हाईकोर्ट को अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने में अत्यधिक सावधानी और संयम बरतना चाहिए।”

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में पंचायत चुनावों के दौरान उत्पन्न हुआ। राज्य चुनाव आयोग ने 28 जून, 2026 को एक संशोधित अधिसूचना जारी कर चुनाव फिर से शुरू किए। प्रतिवादी संख्या 1, नरेंद्र सिंह देवपा ने निर्वाचन क्षेत्र संख्या 11, बड़गांव से जिला पंचायत सदस्य के पद के लिए अपना नामांकन दाखिल किया।

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अपीलकर्ता, संदीप सिंह बोरा ने आपत्ति जताई कि देवपा आवश्यक खुलासे करने में विफल रहे। नतीजतन, रिटर्निंग ऑफिसर ने 9 जुलाई, 2025 के आदेश के माध्यम से देवपा की उम्मीदवारी रद्द कर दी।

देवपा ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। विद्वान एकल न्यायाधीश (Single Judge) ने 11 जुलाई, 2025 को याचिका खारिज कर दी, यह देखते हुए कि अनुच्छेद 243-O के तहत रोक है और चुनाव प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। उसी दिन, शेष उम्मीदवारों के अयोग्य घोषित होने के कारण संदीप सिंह बोरा को निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया गया।

इससे असंतुष्ट होकर, देवपा ने संदीप सिंह बोरा को पक्षकार बनाए बिना एक इंट्रा-कोर्ट अपील (विशेष अपील) दायर की। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 18 जुलाई, 2025 को एक अंतरिम आदेश पारित कर एकल न्यायाधीश के फैसले पर रोक लगा दी और रिटर्निंग ऑफिसर को निर्देश दिया कि वे देवपा को चुनाव चिन्ह आवंटित करें और चुनाव में भाग लेने की अनुमति दें।

संदीप सिंह बोरा ने इस अंतरिम आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट का तर्क

हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने अपने हस्तक्षेप को दो आधारों पर सही ठहराया था:

  1. अनुच्छेद 243-O के तहत रोक इस मामले में लागू नहीं होती क्योंकि चुनौती “नामांकन की अवैध अस्वीकृति” तक सीमित थी, जिसके लिए कोई प्रभावी वैकल्पिक उपचार उपलब्ध नहीं था।
  2. पिछले आपराधिक मामले में बरी होने का खुलासा न करना उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम, 2016 की धारा 90 के तहत निर्दिष्ट अयोग्यता के अंतर्गत नहीं आता है।
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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के तर्क को खारिज कर दिया और इसे अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करार दिया।

अनुच्छेद 243-O के तहत संवैधानिक रोक: कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 243-O(b) का उल्लेख किया, जो यह अनिवार्य करता है कि “किसी भी पंचायत के चुनाव को किसी भी अदालत में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा, सिवाय उस प्राधिकरण को और उस तरीके से प्रस्तुत चुनाव याचिका के, जैसा कि राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी कानून के तहत प्रदान किया गया हो।”

पीठ ने टिप्पणी की:

“इस प्रकार, अनुच्छेद 243-O(b) संविधान के तहत अदालतों द्वारा पंचायत चुनावों से संबंधित मामलों में अधिकार क्षेत्र के प्रयोग पर रोक लगाता है, जहां राज्य विधानमंडल द्वारा ऐसे चुनावों के लिए कानून बनाया गया है।”

पंचायती राज अधिनियम के तहत वैधानिक उपचार: कोर्ट ने उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम, 2016 की धारा 131H पर प्रकाश डाला, जो विशेष रूप से यह प्रावधान करती है कि “किसी भी नामांकन की अनुचित स्वीकृति या अस्वीकृति” सहित अन्य आधारों पर निर्धारित प्राधिकारी के समक्ष आवेदन देकर चुनाव को चुनौती दी जा सकती है।

कोर्ट ने कहा:

“इसलिए, प्रतिवादी संख्या 1 के लिए यह स्वीकार्य नहीं होगा कि वह चुनाव आयोजित करने वाले अधिकारियों द्वारा पंचायती राज अधिनियम के प्रावधानों के अनुपालन की मांग करे, और साथ ही उक्त अधिनियम के तहत उपलब्ध वैधानिक उपचार को दरकिनार करने का विकल्प चुने।”

मिसालें: पीठ ने हरनेक सिंह बनाम चरणजीत सिंह (2005) और लक्ष्मीबाई बनाम कलेक्टर (2020) (जिसमें एन.पी. पोन्नुस्वामी का हवाला दिया गया था) पर भरोसा जताया, जिसमें यह दोहराया गया था कि नामांकन खारिज होने के मामलों में एकमात्र उपाय चुनाव समाप्त होने के बाद प्रस्तुत की जाने वाली चुनाव याचिका है।

हाईकोर्ट की त्रुटियां: शीर्ष अदालत ने माना कि हाईकोर्ट ने निम्नलिखित स्पष्ट त्रुटियां कीं:

  1. अनुच्छेद 243-O की संवैधानिक रोक के खिलाफ कार्य करना।
  2. उस प्रक्रिया के विपरीत निर्देश जारी करना जो पहले ही अंतिम रूप ले चुकी थी (अपीलकर्ता को पहले ही निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया जा चुका था)।
  3. अपीलकर्ता, जो सीधे प्रभावित थे, को सुनवाई का अवसर दिए बिना एकल न्यायाधीश के आदेश पर रोक लगाना।
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निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट द्वारा 18 जुलाई, 2025 को पारित अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया और रिट अपील को खारिज कर दिया।

पीठ के लिए निर्णय लिखते हुए जस्टिस विक्रम नाथ ने निष्कर्ष निकाला:

“इसलिए, हाईकोर्ट को व्यक्तियों के पक्ष में उदार अंतरिम राहत देने से बचना चाहिए और इसके बजाय राज्य भर में चुनावों के सुचारू और निर्बाध संचालन को सुनिश्चित करने में व्यापक जनहित के प्रति सचेत रहना चाहिए।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत शिकायत के इशारे पर चुनाव प्रक्रिया को हल्के में बाधित या रोका नहीं जा सकता है।

मामले का विवरण

  • मामले का शीर्षक: संदीप सिंह बोरा बनाम नरेंद्र सिंह देवपा और अन्य
  • मामला संख्या: सिविल अपील संख्या …. / 2026 (एसएलपी (सी) संख्या 20241/2025 से उत्पन्न)
  • कोरम: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता

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