सुप्रीम कोर्ट ने वकील के खिलाफ कदाचार के निष्कर्ष को रद्द किया: शिकायतकर्ता द्वारा आरोप वापस लेने के बाद अनुशासनात्मक कार्यवाही को ‘अस्थिर’ बताया

सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की अनुशासनात्मक समिति द्वारा पारित एक आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक वकील को पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) का दोषी ठहराया गया था। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट किया कि कदाचार का निष्कर्ष कानूनी रूप से अस्थिर था क्योंकि BCI इस तथ्य पर विचार करने में विफल रही कि शिकायतकर्ता ने विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिया था और शपथ पत्र के माध्यम से शिकायत वापस लेने की इच्छा व्यक्त की थी।

शीर्ष अदालत ने कहा कि एक बार जब शिकायतकर्ता ने वकील की सेवाओं पर संतोष व्यक्त कर दिया और अदालती लागत (Cost) के संबंध में “गलतफहमी” दूर हो गई, तो “अनुशासनात्मक कार्यवाही का मूल आधार ही समाप्त हो गया।”

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील मोंटी गोयल (अपीलकर्ता-वकील) द्वारा एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 38 के तहत दायर की गई थी, जिसमें BCI की अनुशासनात्मक समिति के 4 अप्रैल, 2025 के फैसले को चुनौती दी गई थी। BCI ने अपीलकर्ता को लापरवाही और पेशेवर कदाचार का दोषी पाया था क्योंकि वह समय पर लागत जमा करने में विफल रहे थे, जिसके कारण उनके मुवक्किल, नवरंग सिंह (प्रतिवादी) की एफआईआर रद्द करने वाली याचिका (Quashing Petition) खारिज हो गई थी। BCI ने उन पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था और अनुपालन न करने पर एक साल के लिए लाइसेंस निलंबित करने का आदेश दिया था।

मामले के तथ्य 2018 के हैं, जब प्रतिवादी ने समझौते के आधार पर एफआईआर संख्या 150/2018 (पुलिस थाना समराला, लुधियाना) को रद्द करने के लिए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर करने के लिए अपीलकर्ता को नियुक्त किया था। 28 सितंबर, 2018 को हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली, बशर्ते प्रतिवादी दो सप्ताह के भीतर 10,000 रुपये की लागत जमा करें।

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हालांकि, निर्धारित समय के भीतर लागत जमा नहीं की गई। नतीजतन, 16 नवंबर, 2018 को हाईकोर्ट ने अपने आदेश को वापस ले लिया और अभियोजन पक्ष की कमी (want of prosecution) के कारण याचिका खारिज कर दी, जिससे आपराधिक कार्यवाही फिर से शुरू हो गई। बाद में अपीलकर्ता ने आदेश वापस लेने के लिए आवेदन दायर किया, और 14 जनवरी, 2020 को हाईकोर्ट ने याचिका बहाल कर दी लेकिन लागत बढ़ाकर 50,000 रुपये कर दी। शुरुआती लापरवाही से नाराज होकर, प्रतिवादी ने पंजाब और हरियाणा स्टेट बार काउंसिल के समक्ष शिकायत दर्ज कराई।

कार्यवाही के दौरान हुआ समझौता

अनुशासनात्मक कार्यवाही लंबित रहने के दौरान, वकील और मुवक्किल ने अपने मतभेद सुलझा लिए। हाईकोर्ट ने समझौते का संज्ञान लेते हुए 2 मार्च, 2021 को अपने आदेश में संशोधन किया और बढ़ी हुई लागत को माफ कर दिया। मूल लागत जमा करने के बाद, हाईकोर्ट ने अंततः 12 दिसंबर, 2022 को एफआईआर रद्द कर दी।

इसके बाद, प्रतिवादी ने 15 दिसंबर, 2022 को स्टेट बार काउंसिल को एक शपथ पत्र सौंपा। इसमें उन्होंने कहा कि शिकायत “लागत के संबंध में गलतफहमी” के कारण दर्ज की गई थी, वह अपीलकर्ता की सेवाओं से संतुष्ट हैं, और शिकायत वापस लेना चाहते हैं। हालांकि, चूंकि स्टेट बार काउंसिल एक वर्ष के भीतर कार्यवाही पूरी नहीं कर सकी, इसलिए मामला BCI को स्थानांतरित कर दिया गया था।

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी के शपथ पत्र और शिकायत वापस लेने के अनुरोध के बावजूद, BCI की अनुशासनात्मक समिति ने मामले का फैसला सुनाया और अपीलकर्ता को दोषी ठहराया।

पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस संदीप मेहता ने कहा:

“आक्षेपित निर्णय का अवलोकन करने से पता चलता है कि BCI की अनुशासनात्मक समिति ने अपीलकर्ता-वकील को पेशेवर कदाचार का दोषी ठहराते समय उक्त सामग्री और महत्वपूर्ण पहलू को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। समिति यह समझने में विफल रही कि एक बार जब विवाद सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझ गया और प्रतिवादी-शिकायतकर्ता ने स्वयं विधिवत शपथ पत्र के माध्यम से शिकायत वापस लेने की मांग की, तो शिकायत का मूल आधार ही समाप्त हो गया था।”

अदालत ने BCI द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया की भी आलोचना की और कहा कि दोष का निष्कर्ष उचित सबूतों के बिना “कोरे आरोपों” (Bald Allegations) पर आधारित था। पीठ ने कहा:

“ऐसा प्रतीत होता है कि अपीलकर्ता-वकील को केवल शिकायत में निहित कोरे आरोपों के आधार पर पेशेवर कदाचार का दोषी ठहराया गया है, बिना शिकायतकर्ता की शपथ पर परीक्षा किए और बिना अपीलकर्ता-वकील को जिरह (Cross-examination) का अपरिहार्य अधिकार दिए, जिससे पेशेवर कदाचार का निष्कर्ष कानूनी रूप से अस्थिर हो जाता है।”

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि चूंकि विवाद की उत्पत्ति केवल एक गलतफहमी थी जिसे सुलझा लिया गया था, और शिकायतकर्ता ने वकील की सेवाओं पर पूर्ण संतोष व्यक्त किया था, इसलिए BCI का आदेश कानून या तथ्यों में कायम नहीं रह सकता।

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अदालत ने सिविल अपील संख्या 77 ऑफ 2026 को स्वीकार करते हुए BCI के 4 अप्रैल, 2025 के फैसले को रद्द कर दिया।

केस डिटेल्स:

  • केस टाइटल: मोंटी गोयल बनाम नवरंग सिंह
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 77 ऑफ 2026
  • कोरम: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता

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