डिस्चार्ज अर्जी लंबित रहने के दौरान धारा 482 के तहत क्षेत्राधिकार का उपयोग नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के एक आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है, जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 482 के तहत दायर याचिका को खारिज कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि जब याचिकाकर्ताओं ने “स्वयं सचेत होकर” पहले ही डिस्चार्ज (मुक्ति) के लिए आवेदन कर दिया था, तो उन्हें हाईकोर्ट की विवेकाधीन शक्तियों का लाभ नहीं दिया जा सकता।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस नोंगमी कापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने दीपक अनंत और अन्य द्वारा बॉम्बे हाईकोर्ट के 8 दिसंबर, 2025 के फैसले के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को निस्तारित कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश से जुड़ा है जिसमें हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को राहत देने से मना कर दिया था। याचिकाकर्ताओं ने आपराधिक कार्यवाही में सबसे पहले डिस्चार्ज के लिए आवेदन किया था। हालांकि, जब वह आवेदन अभी लंबित ही था, उन्होंने हाईकोर्ट में धारा 482 के तहत एक नई याचिका दायर कर दी। धारा 482 हाईकोर्ट को यह विवेकाधीन शक्ति देती है कि वह किसी भी अदालती कार्यवाही को रद्द (Quash) कर सके यदि उसे लगे कि न्याय के हित में ऐसा करना आवश्यक है।

याचिकाकर्ताओं के तर्क

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले, विजय बनाम महाराष्ट्र राज्य (2017) 13 SCC 317 का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि अन्य कानूनी उपचार उपलब्ध होने के बावजूद, हाईकोर्ट को धारा 482 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग करना चाहिए था।

कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं द्वारा पेश किए गए ‘विजय बनाम महाराष्ट्र’ मामले के फैसले को वर्तमान मामले से अलग बताया। पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा:

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“हमारे विचार में, उपरोक्त मामले (विजय बनाम महाराष्ट्र) का याचिकाकर्ताओं के वर्तमान मामले पर कोई अनुप्रयोग नहीं है, क्योंकि वह एक ऐसी स्थिति से संबंधित था जहां अन्य उपचार उपलब्ध होने के बावजूद हाईकोर्ट द्वारा धारा 482 के प्रावधानों का उपयोग किया जाना चाहिए था।”

पीठ ने आगे कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ताओं ने खुद एक अलग कानूनी रास्ता चुना था:

“वर्तमान मामले में, याचिकाकर्ताओं ने स्वयं सचेत होकर पहले डिस्चार्ज के लिए आवेदन दायर किया और उक्त आवेदन के लंबित रहने के दौरान ही बाद में धारा 482 के तहत एक आवेदन दायर किया, जो कि एक विवेकाधीन शक्ति है।”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं पाया। हालांकि, याचिकाकर्ताओं के कानूनी अधिकारों की रक्षा करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया:

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“हम यह स्पष्ट करते हैं कि हाईकोर्ट द्वारा पारित आदेश या हमारे द्वारा दिए गए आदेश का उस चुनौती पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा जो डिस्चार्ज आवेदन को खारिज करने वाले आदेश के खिलाफ की गई है।”

इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका और सभी लंबित आवेदनों को निस्तारित कर दिया।

केस विवरण:

  • केस का नाम: दीपक अनंत व अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य
  • केस नंबर: एस.एल.पी. (क्रिमिनल) नंबर 731/2026
  • कोरम: जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस नोंगमी कापम कोटिश्वर सिंह

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