सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि प्रेफरेंशियल इश्यू (वरीयता आवंटन) के माध्यम से जुटाए गए धन का उपयोग यदि उन उद्देश्यों के लिए नहीं किया जाता जिनका खुलासा ऑफर डॉक्यूमेंट्स में किया गया था, तो यह कानूनन अवैध है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शेयरधारकों द्वारा बाद में पारित किया गया कोई भी प्रस्ताव ऐसी अवैध गतिविधियों को वैध नहीं बना सकता। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसने टेरास्कोप वेंचर्स लिमिटेड और उसके निदेशकों पर लगाए गए दंड को हटा दिया था।
मामले का मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या कोई कंपनी, जिसने एक्स्ट्रा-ऑर्डिनरी जनरल मीटिंग (EoGM) के नोटिस में विशिष्ट उद्देश्यों को बताकर धन जुटाया है, बाद में उस धन को किसी अन्य गतिविधि में लगा सकती है और फिर शेयरधारकों के प्रस्ताव के माध्यम से उसे मंजूरी दिला सकती है?
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि फंड का ऐसा डायवर्जन SEBI (PFUTP) नियमों के तहत “धोखाधड़ी” की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने कहा कि जो कार्य प्रारंभ से ही शून्य (void ab initio) हों या सार्वजनिक हित को प्रभावित करते हों, उन्हें बाद में अनुमोदित (ratify) नहीं किया जा सकता। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने सेबी के एडजुडिकेटिंग ऑफिसर (AO) द्वारा कंपनी और उसके निदेशकों पर लगाए गए कुल ₹1.5 करोड़ के जुर्माने को बहाल कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
सितंबर 2012 में, टेरास्कोप वेंचर्स लिमिटेड (तत्कालीन मोरियो इंडस्ट्रीज लिमिटेड) ने 74,50,000 इक्विटी शेयर जारी करने के लिए एक नोटिस जारी किया था। इसमें बताया गया था कि जुटाए गए धन का उपयोग पूंजीगत व्यय, कंपनियों के अधिग्रहण और विदेशों में कार्यालय स्थापित करने के लिए किया जाएगा।
हालांकि, सेबी की जांच में सामने आया कि फंड मिलते ही (16 अक्टूबर से 8 नवंबर 2012 के बीच) कंपनी ने उस पैसे को दूसरी कंपनियों के शेयर खरीदने और बिना किसी दस्तावेजी समझौते के अन्य संस्थाओं को कर्ज देने में लगा दिया।
29 अप्रैल 2020 को, सेबी के एडजुडिकेटिंग ऑफिसर ने कंपनी पर ₹1 करोड़ और मैनेजिंग डायरेक्टर मनोहरलाल सर्राफ व डायरेक्टर गीता मनोहरलाल सर्राफ पर ₹25-25 लाख का जुर्माना लगाया था। SAT ने 2022 में इन आदेशों को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि शेयरधारकों ने 2017 में एक विशेष प्रस्ताव पारित कर फंड के इस उपयोग को अपनी मंजूरी दे दी थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (SEBI): सेबी की ओर से सीनियर एडवोकेट नवीन पाहवा ने तर्क दिया कि फंड जुटाने के तुरंत बाद उसका डायवर्जन कंपनी की धोखाधड़ी की मंशा को दर्शाता है। उन्होंने दलील दी कि कंपनियों अधिनियम की धारा 27, जो प्रॉस्पेक्टस के उद्देश्यों में बदलाव की अनुमति देती है, वह प्राइवेट प्लेसमेंट या फंड के अवैध डायवर्जन के बाद लागू नहीं होती।
एमीकस क्यूरी (Amicus Curiae): कोर्ट द्वारा नियुक्त एमीकस क्यूरी महफूज ए. नाजकी ने तर्क दिया कि भले ही धारा 27 सीधे लागू न हो, लेकिन इसके सिद्धांतों के आधार पर शेयरधारकों को कार्योत्तर (retrospective) मंजूरी देने का अधिकार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि कंपनी के पास उद्देश्यों को बदलने की निहित शक्ति है और कंपनी ने सारा पैसा वापस भी प्राप्त कर लिया था।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
कोर्ट ने धारा 27 के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यह केवल ‘प्रॉस्पेक्टस’ पर लागू होती है, न कि प्राइवेट प्लेसमेंट पर। इसके अलावा, कानून स्पष्ट रूप से ऐसे फंड का उपयोग अन्य सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में ट्रेडिंग के लिए करने से रोकता है।
धोखाधड़ी की अवधारणा पर कोर्ट ने कहा कि PFUTP नियमों के तहत “फ्रॉड” की परिभाषा बहुत व्यापक है और इसमें सामान्य अनुबंध कानून की तरह छल के सख्त प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। कोर्ट ने कहा:
“धोखाधड़ी में किसी तथ्य को सक्रिय रूप से छुपाना या बिना किसी मंशा के किया गया वादा भी शामिल है, यदि वह किसी व्यक्ति को प्रतिभूतियों (securities) में लेनदेन के लिए प्रेरित करता है।”
निवेशकों के हितों पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:
“निवेशक और अन्य हितधारक कंपनी द्वारा किए गए खुलासों के आधार पर ही अपने निवेश का निर्णय लेते हैं। उद्देश्यों का खुलासा करने का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है, जिससे समझौता नहीं किया जा सकता।”
अनुमोदन (Ratification) के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा:
“किसी कानून के अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन करके की गई कार्रवाई अवैध और शून्य होती है। अवैधता की पुष्टि या उसका अनुमोदन नहीं किया जा सकता; केवल अनियमितता को सुधारा जा सकता है।”
कोर्ट ने यह भी पाया कि फंड मिलते ही अगले ही दिन उसे डायवर्ट कर देना यह साबित करता है कि कंपनी की मंशा कभी भी बताए गए उद्देश्यों के लिए पैसा खर्च करने की नहीं थी।
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने SAT के उस निष्कर्ष को गलत बताया जिसमें कहा गया था कि शेयरधारकों की मंजूरी से अवैध कृत्य वैध हो गए। कोर्ट ने कहा कि जब मामला सार्वजनिक कानून और कई हितधारकों की सुरक्षा से जुड़ा हो, तो एक निजी प्रस्ताव कानूनी दायित्व को खत्म नहीं कर सकता।
अपील स्वीकार करते हुए कोर्ट ने SAT के आदेश को किनारे रख दिया और एडजुडिकेटिंग ऑफिसर के ₹1.5 करोड़ के जुर्माने के आदेश को प्रभावी कर दिया।
मामले का विवरण (Case Details)
- केस टाइटल: सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया बनाम टेरास्कोप वेंचर्स लिमिटेड एवं अन्य
- केस नंबर: सिविल अपील संख्या 5209-5211/2022
- पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन
- निर्णय की तिथि: 17 मार्च, 2026
- कानून: सेबी अधिनियम, 1992; सेबी (PFUTP) विनियम, 2003; कंपनियां अधिनियम, 2013; प्रतिभूति अनुबंध (विनियमन) अधिनियम, 1956
- चर्चित वाद: सेबी बनाम किशोर आर. अजमेरा; सेबी बनाम कन्हैयालाल बलदेवभाई पटेल; सेबी बनाम राखी ट्रेडिंग (पी) लिमिटेड; डॉ. ए. लक्ष्मणस्वामी मुदलियार बनाम एलआईसी

