सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAIL) उन पूर्व कर्मचारियों की ग्रेच्युटी से दंडात्मक किराया (Penal Rent) काटने का हकदार है, जिन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद कंपनी द्वारा आवंटित आवास खाली नहीं किया है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि स्टाफ क्वार्टर खाली करना और प्रबंधन द्वारा ग्रेच्युटी जारी करना “पारस्परिक और एक-दूसरे पर निर्भर” (Mutual and Reciprocal) दायित्व हैं, जिन्हें अलग-अलग लागू नहीं किया जा सकता।
झारखंड हाईकोर्ट के एक आदेश को रद्द करते हुए जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने अपने विशेष अधिकार का उपयोग करते हुए सेवानिवृत्त कर्मचारियों के इस विशेष बैच के लिए दंडात्मक किराए की दर 1,000 रुपये प्रति माह तय की। कोर्ट ने माना कि कंपनी की नीति को पूरी सख्ती से लागू करने पर इन कर्मचारियों की पूरी ग्रेच्युटी खत्म हो सकती थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद बोकारो स्टील प्लांट (सेल की एक इकाई) के सेवानिवृत्त कर्मचारियों से जुड़ी अपीलों के समूह से उत्पन्न हुआ था। मुख्य प्रतिवादी, शंभू प्रसाद सिंह, 31 मई 2006 को सेवानिवृत्त हुए थे। सेवानिवृत्ति के बाद, उन्होंने और कई अन्य कर्मचारियों ने निर्धारित अवधि के बाद भी क्वार्टर में रहने की अनुमति मांगी थी। प्रबंधन ने इन अनुरोधों को खारिज कर दिया और बेदखली के नोटिस जारी किए।
इसके बाद मामला झारखंड हाईकोर्ट पहुंचा। वहां की एक खंडपीठ ने 20 जनवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने आदेश (राम नरेश सिंह बनाम बोकारो स्टील लिमिटेड, 2017) का हवाला देते हुए ब्याज सहित पूरी ग्रेच्युटी भुगतान करने का निर्देश दिया था। सेल ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि 2017 का वह आदेश केवल उस मामले के विशेष तथ्यों पर आधारित था और वह कोई कानूनी मिसाल (Precedent) नहीं था।
पक्षों के तर्क
सेल (अपीलकर्ता) की ओर से: प्रबंधन ने तर्क दिया कि ग्रेच्युटी का भुगतान सेल ग्रेच्युटी नियम, 1978 के तहत होता है। नियम 3.2.1(सी) कंपनी को आवास खाली न करने की स्थिति में ग्रेच्युटी रोकने का स्पष्ट अधिकार देता है। सेल का कहना था कि जब कर्मचारी अवैध कब्जे में हैं, तब उन्हें ब्याज के साथ ग्रेच्युटी देने का निर्देश देना “प्रथम दृष्टया अवैध” है। उन्होंने सेक्रेटरी, ओएनजीसी लिमिटेड बनाम वी.यू. वारियर (2005) और सुप्रीम कोर्ट के 2020 के एक अन्य आदेश का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि अवैध कब्जे की स्थिति में दंडात्मक किराया एक “स्वाभाविक परिणाम” है।
पूर्व कर्मचारियों (प्रतिवादी) की ओर से: कर्मचारियों का तर्क था कि हाईकोर्ट का आदेश एक मिसाल (राम नरेश सिंह मामला) पर आधारित था। उन्होंने यह भी कहा कि क्वार्टर रिटेंशन पॉलिसी (26 मार्च 2009) उनके सेवानिवृत्त होने के बाद लागू की गई थी। यह दलील दी गई कि कर्मचारी कुशल या अर्ध-कुशल श्रेणी के थे और कंपनी की नीति के अनुसार भारी दंडात्मक किराया वसूलने से उनके सामने “अत्यधिक कठिनाई” पैदा होगी। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि वह प्रबंधन के विवेक पर छोड़ने के बजाय किराए की एक उचित राशि स्वयं तय करे।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या राम नरेश सिंह (2017) का मामला एक कानूनी मिसाल था और क्या सेल ग्रेच्युटी से दंडात्मक किराया काट सकता है।
1. कानूनी मिसाल और कानून का शासन: कोर्ट ने पाया कि 2017 का आदेश विशेष तथ्यों और न्याय के आधार पर दिया गया था और वह कोई बाइंडिंग प्रेसिडेंट (Binding Precedent) नहीं था। कोर्ट ने कहा:
“कोई मामला केवल उसी बात के लिए मिसाल होता है जो वह तय करता है, और तथ्यों के आधार पर पारित आदेश को संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत मिसाल का दर्जा नहीं दिया जा सकता।”
2. पारस्परिक उत्तरदायित्व: कंपनी की संपत्तियों के संबंध में नियोक्ता और कर्मचारी के बीच के संबंधों को स्पष्ट करते हुए पीठ ने कहा:
“ये दायित्व पारस्परिक हैं। पूर्व कर्मचारी स्टाफ क्वार्टर का कब्जा सौंपने के लिए बाध्य है, और प्रबंधन वैध कटौती करने के बाद ग्रेच्युटी जारी करने के लिए बाध्य है। किसी भी दायित्व को दूसरे से स्वतंत्र होकर लागू नहीं किया जा सकता।”
3. ब्याज और ग्रेच्युटी रोकना: सेल ग्रेच्युटी नियमों का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अवैध कब्जे की अवधि के दौरान रोकी गई ग्रेच्युटी पर कोई ब्याज देय नहीं है। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“ऐसी परिस्थितियों में ब्याज देना प्रभावी रूप से सार्वजनिक परिसर पर अनधिकृत कब्जे को पुरस्कृत करने जैसा होगा।”
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने सेल की अपीलों को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। हालांकि, सेवानिवृत्त कर्मचारियों और प्रबंधन के हितों में संतुलन बनाने के लिए कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- निश्चित दंडात्मक किराया: कोर्ट ने मानवता के आधार पर इस बैच के लिए दंडात्मक किराए की राशि 1,000 रुपये प्रति माह तय की। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि कई कर्मचारी साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से थे और सख्त नीति से उनकी ग्रेच्युटी पूरी तरह समाप्त हो सकती थी।
- एक साथ निष्पादन: प्रबंधन को चार सप्ताह के भीतर बकाया राशि की गणना कर सूचित करना होगा। इसके बाद कर्मचारियों को क्वार्टर खाली करने के लिए अतिरिक्त चार सप्ताह का समय दिया गया है। ग्रेच्युटी का भुगतान और कब्जे की वापसी दोनों कार्य एक साथ किए जाएंगे।
- ब्याज पर रोक: अवैध कब्जे की अवधि के लिए रोकी गई ग्रेच्युटी पर कोई ब्याज नहीं दिया जाएगा।
कोर्ट ने अंत में स्पष्ट किया कि 1,000 रुपये की दर केवल इसी मामले के लिए तय की गई है और इसे सेल के नियमों के तहत किसी अन्य मामले में मिसाल के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: द मैनेजमेंट ऑफ स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया और अन्य बनाम शंभू प्रसाद सिंह और अन्य
- केस नंबर: सिविल अपील संख्या… 2026 (@SLP (C) संख्या 025516-025517/2024)
- पीठ: जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी
- दिनांक: 18 मार्च, 2026

