सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में गुजरात हाईकोर्ट के 2019 के निर्णय को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि स्पेशल इकोनॉमिक जोन (SEZ) से डोमेस्टिक टैरिफ एरिया (DTA) में हटाई गई विद्युत ऊर्जा (Electrical Energy) पर कोई कस्टम ड्यूटी (सीमा शुल्क) नहीं लगाई जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 12 के तहत इस तरह की लेवी (Levy) के लिए कोई ‘चार्जिंग प्रोविजन’ या कानूनी आधार मौजूद नहीं है। इसके परिणामस्वरूप, कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह अडानी पावर लिमिटेड से 16 सितंबर 2010 से 15 फरवरी 2016 के बीच वसूल की गई कस्टम ड्यूटी वापस करे।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता, अडानी पावर लिमिटेड, गुजरात के मुंद्रा SEZ में एक थर्मल पावर प्लांट संचालित करती है। वहां उत्पादित बिजली का कुछ हिस्सा SEZ के भीतर उपयोग किया जाता है और एक बड़ा हिस्सा DTA में खरीदारों को सप्लाई किया जाता है। SEZ अधिनियम, 2005 की धारा 30 के तहत, SEZ से DTA में हटाए गए सामान पर कस्टम ड्यूटी तब लगती है “जैसे कि वह सामान भारत में आयात किया गया हो”। हालांकि, 2009 से पहले, आयातित बिजली पर ड्यूटी की दर शून्य (Nil) थी, जिसका अर्थ था कि SEZ से DTA क्लीयरेंस पर भी कोई कस्टम ड्यूटी नहीं बनती थी।
2010 में, केंद्र सरकार ने नोटिफिकेशन संख्या 25/2010-Cus. जारी किया, जो दिखने में ‘छूट’ (Exemption) जैसा था लेकिन प्रभावी रूप से इसने 26 जून 2009 से पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospective effect) से 16% एड वैलोरम ड्यूटी लगा दी। बाद में इसे नोटिफिकेशन संख्या 91/2010-Cus. (10 पैसे प्रति यूनिट) और नोटिफिकेशन संख्या 26/2012-Cus. (3 पैसे प्रति यूनिट) द्वारा बदल दिया गया।
अदानी पावर ने गुजरात हाईकोर्ट में 16% लेवी को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने 15 जुलाई 2015 के अपने फैसले में इसे अवैध (Ultra vires) घोषित कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2015 में इस फैसले की पुष्टि की थी। हालांकि, 16 सितंबर 2010 से 15 फरवरी 2016 की अवधि के लिए, अधिकारियों ने बाद की अधिसूचनाओं के तहत ड्यूटी वसूलना जारी रखा। अडानी पावर ने 2015 के फैसले के आधार पर इस अवधि के लिए रिफंड मांगते हुए 2016 में एक नई याचिका दायर की। गुजरात हाईकोर्ट ने 2019 में इस याचिका को खारिज कर दिया, यह तर्क देते हुए कि पहले की राहत केवल उस विशिष्ट अधिसूचना और अवधि तक सीमित थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (अडानी पावर लिमिटेड) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदंबरम ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट अपने ही 2015 के कानून की घोषणा को लागू करने में विफल रहा। उन्होंने कहा कि कानूनी आधार वही है—SEZ से DTA बिजली पर कोई कस्टम ड्यूटी नहीं लगाई जा सकती। उनका तर्क था कि केंद्र सरकार दर को 10 पैसे या 3 पैसे में बदलकर परोक्ष रूप से वह हासिल नहीं कर सकती जिसे पहले ही अवैध घोषित किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि ‘छूट’ अधिसूचनाओं का उपयोग नई लेवी बनाने के लिए करना शक्ति का दुरुपयोग (Colourable exercise of power) है।
प्रतिवादी (भारत संघ) की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल राघव शंकर ने तर्क दिया कि 2015 का फैसला स्पष्ट रूप से केवल नोटिफिकेशन संख्या 25/2010-Cus. और 15 सितंबर 2010 तक की अवधि तक सीमित था। उन्होंने दलील दी कि बाद की अधिसूचनाएं (91/2010-Cus. और 26/2012-Cus.) अलग वित्तीय उपाय थे जिन्हें पिछली कार्यवाही में विशेष रूप से चुनौती नहीं दी गई थी, इसलिए उनकी वैधता को चुनौती दिए बिना रिफंड नहीं दिया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने पाया कि यह विवाद प्रत्यायोजित विधान (Delegated Legislation) की सीमाओं और न्यायिक अनुशासन से जुड़े बुनियादी सवाल उठाता है।
1. 2015 के फैसले की प्रकृति कोर्ट ने कहा कि गुजरात हाईकोर्ट का 2015 का फैसला सीमित नहीं था, बल्कि कानून की एक सामान्य घोषणा थी। इसने स्थापित किया था कि:
- कस्टम एक्ट की धारा 12 के तहत कोई वैध ‘चार्जिंग इवेंट’ नहीं है क्योंकि SEZ से DTA में बिजली की सप्लाई “भारत में आयात” नहीं है।
- कार्यपालिका धारा 25 (छूट देने की शक्ति) का उपयोग नई लेवी लगाने के लिए नहीं कर सकती।
- लेवी की संरचना एक मनमाना दोहरा बोझ पैदा करती है, क्योंकि इनपुट पर शुल्क पहले ही SEZ नियमों के नियम 47(3) के तहत न्यूट्रलाइज किया जा चुका होता है।
2. शक्ति का छद्म प्रयोग (Colourable Exercise of Power) अदालत ने सरकार की कार्रवाई को “प्रत्यायोजित शक्ति का छद्म प्रयोग” करार दिया। न्यायमूर्ति कुमार ने फैसले में लिखा:
“छूट देने की शक्ति कर (Tax) लगाने की शक्ति नहीं है… कार्यपालिका, छूट देने के बहाने अधीनस्थ कानून (Subordinate instrument) के माध्यम से कराधान के क्षेत्र का विस्तार नहीं कर सकती।”
कोर्ट ने केंद्र के इस तर्क को खारिज कर दिया कि बाद की अधिसूचनाएं वैध थीं क्योंकि उन्हें विशेष रूप से रद्द नहीं किया गया था। पीठ ने कहा:
“जहां जड़ ही अधिकार क्षेत्र से बाहर (Ultra vires) हो, वहां शाखा अपनी पत्तियों को बदलकर वैधता का दावा नहीं कर सकती।”
3. न्यायिक अनुशासन न्यायिक अनुशासन के मुद्दे पर, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की 2019 की खंडपीठ की आलोचना की कि उसने बाध्यकारी 2015 के मिसाल (Precedent) के प्रभाव को संकीर्ण कर दिया। कोर्ट ने कहा कि एक समनुरूप पीठ (Coordinate Bench) स्थापित कानून को दरकिनार नहीं कर सकती। यदि 2019 की पीठ को पिछले फैसले की सत्यता पर संदेह था, तो एकमात्र स्वीकार्य रास्ता मामले को बड़ी पीठ (Larger Bench) को भेजना था।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए गुजरात हाईकोर्ट के 28 जून 2019 के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने घोषित किया कि प्रासंगिक अवधि के दौरान SEZ से DTA को क्लियर की गई विद्युत ऊर्जा पर कस्टम ड्यूटी की लेवी “कानून के अधिकार के बिना” थी।
कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- प्रतिवादी (सरकार) 16 सितंबर 2010 से 15 फरवरी 2016 की अवधि के लिए अपीलकर्ता द्वारा जमा की गई कस्टम ड्यूटी की राशि वापस करेंगे।
- क्षेत्रीय सीमा शुल्क आयुक्त द्वारा आठ सप्ताह के भीतर सत्यापन और रिफंड की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
- रिफंड पर कोई ब्याज नहीं दिया जाएगा।
- अपील में शामिल अवधि के लिए बिजली पर कस्टम ड्यूटी के संबंध में अपीलकर्ता के खिलाफ कोई और मांग लागू नहीं की जाएगी।
केस विवरण
- केस टाइटल: अडानी पावर लिमिटेड और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य
- केस नंबर: सिविल अपील (SLP (Civil) No. 24729/2019 से उद्भुत)
- कोरम: न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया

