सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: दिव्यांगता पेंशन के एरियर को तीन साल तक सीमित नहीं किया जा सकता, 1996/2006 से भुगतान के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि दिव्यांगता पेंशन (Disability Pension) के एरियर, विशेष रूप से “ब्रॉड बैंडिंग” (Broad Banding) के लाभ को आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) के समक्ष आवेदन दायर करने से पूर्व के तीन वर्षों की अवधि तक सीमित नहीं किया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि पात्र पूर्व सैनिक 1 जनवरी 1996 या 1 जनवरी 2006 (जो भी लागू हो) की निर्धारित कट-ऑफ तिथियों से एरियर पाने के हकदार हैं।

जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने भारत संघ (Union of India) द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दिया और पूर्व सैनिकों की अपीलों को स्वीकार करते हुए उस विवाद का निपटारा कर दिया जो एरियर के भुगतान की अवधि को लेकर बना हुआ था।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह विवाद आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) के अलग-अलग फैसलों के कारण उत्पन्न हुआ था। ट्रिब्यूनल की कुछ पीठों ने निर्दिष्ट कट-ऑफ तिथियों (1996 या 2006) से दिव्यांगता पेंशन के एरियर के भुगतान का निर्देश दिया था, जबकि अन्य पीठों ने परिसीमा (Limitation) के सिद्धांतों का हवाला देते हुए लाभ को आवेदन दाखिल करने से तीन साल पहले तक सीमित कर दिया था।

मामले का मुख्य मुद्दा दिव्यांगता तत्वों की “ब्रॉड बैंडिंग” की अवधारणा पर केंद्रित था। पांचवें केंद्रीय वेतन आयोग के बाद, सरकार ने 31 जनवरी 2001 को निर्देश जारी किए थे, जिसमें दिव्यांगता प्रतिशत की गणना को उदार बनाया गया था (उदाहरण के लिए, 50% से कम दिव्यांगता को 50% माना जाना)। शुरुआत में, यह लाभ उन कर्मियों को नहीं दिया गया था जो दिव्यांगता के साथ सेवानिवृत्त (superannuated) हुए थे, बल्कि केवल उन्हें दिया गया था जिन्हें सेवा से ‘इनवैलिडेट आउट’ (invalidated out) किया गया था।

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इस भेद को सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम राम अवतार (2014) के अपने तीन-जजों की पीठ के फैसले में समाप्त कर दिया था। कोर्ट ने माना था कि कार्यकाल पूरा होने पर सेवानिवृत्त होने वाले कर्मी भी, जिनकी दिव्यांगता सैन्य सेवा के कारण बढ़ी है या उससे संबंधित है, ब्रॉड बैंडिंग के पात्र हैं। इसके बाद एरियर के लिए बड़ी संख्या में दावे दायर किए गए।

अदालत के समक्ष दलीलें

भारत संघ की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल ने तर्क दिया कि एरियर के दावों पर परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act) और आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल एक्ट, 2007 की धारा 22 लागू होनी चाहिए। संघ का कहना था कि “लगातार हो रही गलती” (continuing wrong) के मामलों में भी एरियर निर्धारित परिसीमा अवधि (आमतौर पर तीन साल) से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इसके लिए यूनियन ऑफ इंडिया बनाम तरसेम सिंह (2008) के फैसले का हवाला दिया गया।

इसके विपरीत, पूर्व सैनिकों ने तर्क दिया कि एरियर का दावा करने का अधिकार केवल 10 दिसंबर 2014 को राम अवतार के फैसले के बाद ही स्पष्ट हुआ था। उन्होंने कहा कि राम अवतार का फैसला इन रेम (in rem – यानी सभी समान स्थिति वाले व्यक्तियों पर लागू) था और पूर्ण एरियर से इनकार करना उनके निहित संपत्ति अधिकारों का हनन होगा।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

1. संपत्ति के अधिकार के रूप में पेंशन सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि पेंशन राज्य की कृपा पर निर्भर कोई खैरात (Bounty) नहीं है, बल्कि यह पिछली सेवा के मुआवजे का एक आस्थगित (deferred) हिस्सा है।

कोर्ट ने कहा, “पेंशन संबंधी पात्रताएं संपत्ति का चरित्र रखती हैं, और इन्हें कानून के अधिकार के बिना रोका, कम या समाप्त नहीं किया जा सकता है। यह सिद्धांत दिव्यांगता पेंशन पर पूरी ताकत के साथ लागू होता है, जो केवल सेवा की लंबाई पर आधारित नहीं है, बल्कि राष्ट्र की सेवा के दौरान या उससे संबंधित कारणों से सशस्त्र बलों के सदस्य को हुई शारीरिक क्षति पर आधारित है।”

2. एक आदर्श नियोक्ता के रूप में भारत संघ अदालत ने कहा कि भारत संघ ने पहले ही एरियर का भुगतान करने का एक सचेत नीतिगत निर्णय लिया था। पीठ ने सरकार के 18 अप्रैल 2016 के पत्र का उल्लेख किया, जिसमें ब्रॉड बैंडिंग लाभों को लागू करने के लिए मंजूरी दी गई थी।

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“भारत संघ, एक आदर्श नियोक्ता (Model Employer) के रूप में, उम्मीद की जाती है कि वह राष्ट्र की सेवा करने वालों को दिए गए लाभों के प्रशासन में निष्पक्षता, निरंतरता और समता के साथ कार्य करेगा। जब किसी लाभ को नीति द्वारा मान्यता दी जाती है और न्यायिक निर्णय द्वारा पुष्टि की जाती है, तो इसका आवेदन चयनात्मक या असमान नहीं हो सकता है।”

3. परिसीमा (Limitation) के तर्क को अस्वीकार किया संघ द्वारा तरसेम सिंह के फैसले पर दिए गए तर्क को संबोधित करते हुए, कोर्ट ने इसे वर्तमान तथ्यों पर लागू नहीं माना। पीठ ने कहा कि सेवानिवृत्त सैनिकों के लिए ब्रॉड बैंडिंग के संबंध में कानूनी स्थिति 2014 में राम अवतार के फैसले तक अनिश्चित बनी हुई थी।

कोर्ट ने कहा: “पूर्व सैनिकों को ट्रिब्यूनल में जाने का अधिकार केवल 10.12.2014 को प्राप्त हुआ, यानी जब इस कोर्ट द्वारा राम अवतार का फैसला सुनाया गया… मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में, हम पाते हैं कि पूर्व सैनिकों द्वारा दायर मूल आवेदनों में कोई देरी या लापरवाही नहीं है जो उन्हें दिव्यांगता पेंशन के एरियर के राहत का दावा करने से वंचित करती हो।”

कोर्ट ने आगे कहा कि चूंकि सरकार ने खुद नीतिगत रूप से यह निर्धारित किया था कि एरियर 01.01.1996 या 01.01.2006 से देय हैं, इसलिए वह बाद में इससे पीछे नहीं हट सकती और यह तर्क नहीं दे सकती कि एरियर को तीन साल तक सीमित किया जाना चाहिए।

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निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. भारत संघ की अपीलें खारिज: कोर्ट ने एरियर को सीमित करने की मांग करने वाली भारत संघ की अपीलों में कोई योग्यता नहीं पाई और उन्हें खारिज कर दिया।
  2. पूर्व सैनिकों की अपीलें स्वीकार: ट्रिब्यूनल के वे आदेश जो मूल आवेदन दाखिल करने से तीन साल पहले तक एरियर को सीमित करते थे, उन्हें रद्द कर दिया गया।
  3. भुगतान का निर्देश: अपीलकर्ता दिव्यांगता पेंशन के हकदार हैं, जिसमें ब्रॉड बैंडिंग का लाभ भी शामिल है। यह लाभ 01.01.1996 या 01.01.2006 (जैसा भी मामला हो) से प्रभावी होगा।
  4. ब्याज: एरियर पर 6% प्रति वर्ष की दर से ब्याज देय होगा।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: यूनियन ऑफ इंडिया थ्रू इट्स सेक्रेटरी और अन्य बनाम सार्जेंट गिरीश कुमार और अन्य आदि।
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 6820-6824/2018 (और अन्य संबंधित मामले)
  • पीठ: जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे

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