सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसले में कहा कि न्यायालयों को शैक्षणिक मानकों से संबंधित विशेषज्ञों की राय में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए, जब तक कि निर्धारित योग्यताएं या शर्तें मनमानी न हों। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने वेतनमान लागू करने से संबंधित बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्णयों के खिलाफ दायर अपीलों पर फैसला सुनाते हुए दी।
यह मामला एक विशिष्ट सोसायटी द्वारा संचालित इंजीनियरिंग और तकनीकी संस्थानों के शिक्षकों को छठे केंद्रीय वेतन आयोग के संशोधित वेतनमान लागू करने से जुड़ा था। ये संस्थान अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) द्वारा निर्धारित योग्यता मानकों का पालन करते हैं, जो भारत में तकनीकी शिक्षा के लिए एक वैधानिक निकाय है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दोहराया कि शिक्षण पदों पर नियुक्ति और प्रवेश के लिए योग्यता तय करना जैसे निर्णय वैधानिक विशेषज्ञ निकायों—जैसे AICTE—पर ही छोड़ा जाना चाहिए। न्यायालय ने स्पष्ट किया, “जब तक यह सिद्ध न हो जाए कि निर्धारित योग्यताएं मनमानी या विकृत हैं, तब तक न्यायालय इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा।”

हालांकि, पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि इससे न्यायालय की न्यायिक समीक्षा की शक्ति समाप्त नहीं होती। उन्होंने कहा कि यह शक्ति केवल उन्हीं मामलों में प्रयोग की जानी चाहिए, जहाँ निर्धारित योग्यताएं गैरकानूनी, मनमानी हों या जहाँ किसी कानूनी सिद्धांत की व्याख्या आवश्यक हो।
अदालत ने शिक्षकों के दो वर्गों के बीच भेद भी स्पष्ट किया। उसने कहा कि 15 मार्च 2000 से पहले नियुक्त किए गए व्याख्याताओं या सहायक प्राध्यापकों के लिए पीएच.डी. अनिवार्य नहीं थी, इसलिए वे हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार छठे वेतन आयोग के लाभ पाने के पात्र हैं। इसके विपरीत, 15 मार्च 2000 के बाद नियुक्त वे शिक्षक जो पीएच.डी. नहीं रखते और जिन्होंने सात वर्षों के भीतर यह डिग्री प्राप्त नहीं की, वे तब तक उच्च वेतनमान या एसोसिएट प्रोफेसर का दर्जा पाने के पात्र नहीं होंगे, जब तक वे योग्यता पूरी न कर लें।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जो शिक्षक तय समयसीमा के बाद पीएच.डी. प्राप्त करते हैं, वे उच्च वेतनमान और एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में पुनःवर्गीकरण के लिए आवेदन कर सकते हैं। ऐसे सभी आवेदन संबंधित संस्थानों और AICTE द्वारा कानूनी प्रक्रिया के अनुसार विचाराधीन होंगे।