उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें एक सीनियर मैनेजर की ‘सेवा से बर्खास्तगी’ की सजा को बदलकर ‘अनिवार्य सेवानिवृत्ति’ (Compulsory Retirement) कर दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक उच्च पदस्थ बैंक अधिकारी, सजा के मामले में अपने से निचले स्तर के कर्मचारियों के साथ समानता (Parity) का दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि “जितना बड़ा भरोसा किया जाता है, जांच भी उतनी ही सख्त होनी चाहिए।”
मामले की पृष्ठभूमि
उत्तरदाता, श्री राज कुमार ने 1987 में पंजाब एंड सिंध बैंक (P&SB) में क्लर्क/कैशियर के रूप में अपनी सेवा शुरू की थी। दिसंबर 2011 तक वह सीनियर मैनेजर (MMGS-III स्केल) के पद पर पहुंच चुके थे, जब उन्हें निलंबित किया गया। पंजाब एंड सिंध ऑफिसर एम्प्लाइज (कंडक्ट) रेगुलेशन, 1981 के तहत हुई जांच के बाद, 25 नवंबर 2024 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।
उन पर आरोप था कि उन्होंने एक अन्य अधिकारी और एक गनमैन के साथ मिलकर ग्राहकों के पैसे का गबन किया और बैंक के रिकॉर्ड चुराए। इस मामले में बैंक ने गनमैन को ‘अनिवार्य सेवानिवृत्ति’ और दूसरे अधिकारी को वेतन में “दो चरणों की कटौती” की सजा दी, जबकि उत्तरदाता को बर्खास्त कर दिया। उत्तरदाता ने हाईकोर्ट में इस सजा को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत भेदभावपूर्ण है। दिल्ली हाईकोर्ट के सिंगल जज और बाद में डिवीजन बेंच ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए उनकी सजा कम कर दी थी।
पक्षों की दलीलें
बैंक की ओर से वकील श्री राजेश कुमार गौतम ने तर्क दिया कि सजा के मामले में हाईकोर्ट का हस्तक्षेप स्थापित कानूनी सिद्धांतों के विपरीत है। वहीं, उत्तरदाता के वकील श्री जी.एस. चतुर्वेदी ने दलील दी कि उनके मुवक्किल के साथ “अन्यायपूर्ण भेदभाव” किया गया है। उन्होंने हाईकोर्ट की एक पुरानी टिप्पणी का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि उत्तरदाता ने शायद दबाव में पैसे जमा किए थे, हालांकि बाद में इस दलील पर अधिक जोर नहीं दिया गया।
कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने इस बात की समीक्षा की कि क्या हाईकोर्ट को अनुशासनात्मक प्राधिकरण (Disciplinary Authority) के विवेक में हस्तक्षेप करना चाहिए था।
सजा की न्यायिक समीक्षा पर
कोर्ट ने रंजीत ठाकुर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1987) और बी.सी. चतुर्वेदी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1995) जैसे मामलों का संदर्भ देते हुए कहा कि सजा में हस्तक्षेप तभी किया जा सकता है जब वह “कोर्ट की अंतरात्मा को झकझोर देने वाली” हो। कोर्ट ने कहा:
“हस्तक्षेप तब उचित हो सकता है जब कोर्ट को लगे कि अनुशासनात्मक प्राधिकरण ने ‘एक अखरोट फोड़ने के लिए स्लेजहैमर (बड़े हथौड़े) का इस्तेमाल’ किया है।”
समानता (Parity) के सिद्धांत को किया खारिज
कोर्ट ने इस मामले में हाईकोर्ट द्वारा ‘समानता’ के सिद्धांत को लागू करने के फैसले को पूरी तरह गलत ठहराया। बेंच ने कहा कि उत्तरदाता का पद अन्य सह-दोषियों की तुलना में काफी ऊंचा था। कोर्ट ने रेखांकित किया:
“अधिकार अपने साथ जवाबदेही लाते हैं; जितना उच्च पद, उतनी ही अधिक जवाबदेही। उत्तरदाता का पद केवल नाममात्र का नहीं था; इसके साथ जिम्मेदारी और ईमानदारी का एक बढ़ा हुआ स्तर जुड़ा था।”
बेंच ने आगे कहा:
“बैंक के एक शाखा प्रबंधक की तुलना उसके गनमैन के साथ करना तर्क और बुद्धि की स्पष्ट अवहेलना है।”
कोर्ट ने सेंगरा सिंह बनाम पंजाब राज्य (1983) जैसे मामलों से इस केस को अलग बताया और कहा कि पद का अंतर और नियोक्ता का बढ़ा हुआ भरोसा, अधिक सख्त सजा देने का एक ठोस आधार है।
निर्णय
उच्चतम न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि गबन की गंभीरता और उत्तरदाता के पद को देखते हुए बर्खास्तगी की सजा न तो असंगत थी और न ही तर्कहीन। कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के आदेशों को सेट-असाइड (रद्द) कर दिया और बैंक द्वारा दी गई बर्खास्तगी की मूल सजा को बहाल कर दिया।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: पंजाब एंड सिंध बैंक बनाम श्री राज कुमार
- केस नंबर: सिविल अपील नंबर 847 ऑफ 2026 (2026 INSC 313)
- बेंच: जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा
- तारीख: 02 अप्रैल, 2026

