सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए गठित संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी थी। यह मामला पिछले साल उनके आधिकारिक आवास से भारी मात्रा में नकदी की बरामदगी से जुड़ा है।
एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, शीर्ष अदालत ने जस्टिस वर्मा की उस अंतरिम प्रार्थना को भी अस्वीकार कर दिया, जिसमें उन्होंने जांच समिति के समक्ष अपना जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की थी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित जांच पैनल की वैधता को चुनौती देने वाली जस्टिस वर्मा की याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि संसद में महाभियोग प्रस्ताव की स्वीकृति से जुड़ी प्रक्रियात्मक खामियों के कारण, न्यायाधीश (जांच) अधिनियम (Judges (Inquiry) Act) के तहत इस समिति का गठन कानूनन सही नहीं है। अदालत ने पैनल की कानूनी वैधता पर अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए, जस्टिस वर्मा को समिति के समक्ष जवाब दाखिल करने की समय सीमा बढ़ाने से इनकार कर दिया। उन्हें 12 जनवरी तक अपना जवाब देना है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद पिछले साल 14 मार्च का है, जब दिल्ली में जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास पर कथित रूप से भारी मात्रा में मुद्रा बरामद की गई थी। उस समय वह दिल्ली में हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में कार्यरत थे। इस घटना के बाद, उनका तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया था।
बरामदगी के बाद, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने मामले की आंतरिक जांच (in-house inquiry) का आदेश दिया था। इस उद्देश्य के लिए गठित तीन सदस्यीय पैनल ने 4 मई को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें जस्टिस वर्मा को कदाचार का दोषी पाया गया। इन निष्कर्षों के आधार पर, तत्कालीन सीजेआई ने जस्टिस वर्मा को इस्तीफा देने या महाभियोग की कार्यवाही का सामना करने की सलाह दी थी। जब उन्होंने पद छोड़ने से इनकार कर दिया, तो जांच रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेज दी गई।
इससे पहले, जस्टिस वर्मा ने इन-हाउस जांच रिपोर्ट को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन 7 अगस्त को उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी। इसके कुछ ही दिनों बाद, 12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आरोपों की जांच के लिए एक अलग तीन सदस्यीय संसदीय समिति का गठन किया।
कानूनी दलीलें: संसदीय पैनल की वैधता पर सवाल
जस्टिस वर्मा द्वारा उठाया गया मुख्य कानूनी मुद्दा संसदीय जांच समिति के गठन के लिए अपनाई गई प्रक्रिया से संबंधित है।
जस्टिस वर्मा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि समिति का गठन “कानून के विपरीत” है। उन्होंने दलील दी कि जब किसी न्यायाधीश को हटाने के प्रस्ताव के लिए संसद के दोनों सदनों में एक ही दिन नोटिस दिए जाते हैं, तो जांच समिति का गठन तभी किया जा सकता है जब प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार कर लिया जाए।
रोहतगी ने इस बात पर जोर दिया कि जहां लोकसभा में प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया था, वहीं राज्यसभा के उपसभापति द्वारा इसी तरह के प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया था। उनका तर्क था कि इस अस्वीकृति के कारण लोकसभा अध्यक्ष द्वारा एकतरफा रूप से समिति का गठन करना अवैध है।
रोहतगी ने कहा, “जहां प्रस्ताव के नोटिस दोनों सदनों को एक ही तारीख पर ‘दिए’ जाते हैं, वहां कोई समिति गठित नहीं की जाएगी, जब तक कि प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार नहीं किया जाता।” उन्होंने आगे कहा कि ऐसी परिस्थितियों में, न्यायाधीश (जांच) अधिनियम के तहत लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति द्वारा संयुक्त रूप से समिति का गठन किया जाना अनिवार्य है।
कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने 16 दिसंबर को हुई पिछली सुनवाई के दौरान इस प्रक्रियात्मक चुनौती की जांच करने पर सहमति व्यक्त की थी। गुरुवार को दलीलें सुनने के बाद, जस्टिस दत्ता और जस्टिस शर्मा की पीठ ने याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
जहां तक संसदीय पैनल के समक्ष जवाब देने के लिए समय बढ़ाने के याचिकाकर्ता के अनुरोध का सवाल है, कोर्ट ने इसमें हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और वर्तमान कार्यक्रम को बरकरार रखा, जिसके तहत 12 जनवरी तक जवाब दिया जाना आवश्यक है।

