सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनावों को नियमित करने के लिए 2006 की लिंगदोह समिति की रिपोर्ट के क्रियान्वयन की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका को “प्रचार के लिए दायर जनहित याचिका” करार दिया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता शिव कुमार त्रिपाठी की याचिका को सुनवाई योग्य नहीं मानते हुए खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान, CJI ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “आप तो बस बाहर जाकर मीडिया को संबोधित करना चाहते हैं। यह याचिका सिर्फ प्रचार के लिए है।”
त्रिपाठी के वकील ने दलील दी थी कि यह याचिका छात्र संघ चुनावों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और पैसे व बाहुबल के दखल को रोकने के उद्देश्य से लिंगदोह समिति की सिफारिशों को लागू करवाने के लिए दायर की गई है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर वर्ष 2005 में केंद्र सरकार ने लिंगदोह समिति का गठन किया था। समिति ने वर्ष 2006 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, जिसे शीर्ष अदालत ने स्वीकार कर देशभर के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के लिए अनिवार्य बना दिया था।
समिति की प्रमुख सिफारिशें इस प्रकार थीं:
- स्नातक छात्रों के लिए चुनाव लड़ने की आयु सीमा 17 से 22 वर्ष तय की गई
- स्नातकोत्तर छात्रों के लिए आयु सीमा 24 से 25 वर्ष निर्धारित
- प्रचार सामग्री में छपे पोस्टरों और बैनरों पर रोक
- चुनावी खर्च की सीमा निर्धारित करना
- प्रत्याशियों के लिए न्यूनतम उपस्थिति का प्रावधान
इन सिफारिशों का उद्देश्य शिक्षा के माहौल को बनाए रखते हुए छात्र राजनीति से अपराधीकरण और अत्यधिक खर्च पर रोक लगाना था। हालांकि, कई शिक्षण संस्थानों में इन नियमों का आंशिक या विविध रूप से पालन किया जा रहा है।
अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को “प्रचारात्मक” बताकर खारिज कर दिया है, छात्र राजनीति में लिंगदोह समिति की सिफारिशों के पूर्ण क्रियान्वयन की मांग पर फिर से न्यायिक हस्तक्षेप की संभावनाएं फिलहाल क्षीण हो गई हैं।

