यह जनहित याचिका विश्व वैदिक सनातन संघ के अध्यक्ष जितेन्द्र सिंह ने अधिवक्ता वरुण कुमार सिन्हा के माध्यम से दायर की थी। याचिका में अजमेर स्थित सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर प्रधानमंत्री सहित सरकार द्वारा चादर चढ़ाने की परंपरा को “राज्य प्रायोजित धार्मिक सम्मान” बताते हुए इसे राष्ट्र की संप्रभुता और संविधान की मूल भावना के विरुद्ध बताया गया।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि इस तरह के सरकारी कृत्य संविधानिक या कानूनी प्रावधानों पर आधारित नहीं हैं और यह एक धर्म विशेष को सरकारी मान्यता देने जैसा है। याचिका में यह भी दावा किया गया कि ख्वाजा चिश्ती भारत में 12वीं शताब्दी में मोहम्मद गौरी के आक्रमण के समय आए थे और उनके नाम पर बना यह मक़बरा इतिहास के तथ्यों के अनुसार एक हिंदू मंदिर पर बना हुआ है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट की पीठ इन तर्कों से सहमत नहीं हुई। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह के विषय अदालत की रिट याचिका के दायरे में नहीं आते और इन पर न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है। कोर्ट ने याचिका को “न्यायिक रूप से विचारणीय नहीं” करार देते हुए खारिज कर दिया।
साथ ही, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि इस याचिका की खारिजी का असर अजमेर की निचली अदालत में 2024 से लंबित सिविल मुकदमे पर नहीं पड़ेगा। “इस याचिका की खारिजी सिविल वाद को प्रभावित नहीं करेगी,” कोर्ट ने आदेश में कहा।
यह याचिका 22 दिसंबर को उर्स से ठीक पहले तत्काल सुनवाई की मांग के साथ मेंशन की गई थी, लेकिन तब भी सुप्रीम कोर्ट ने तात्कालिक सुनवाई से इनकार कर दिया था। उसी दिन केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से अजमेर शरीफ दरगाह पर चादर पेश की थी। यह परंपरा भारत की आजादी के बाद से सभी प्रधानमंत्रियों द्वारा निभाई जाती रही है।
याचिका में कहा गया कि प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा धार्मिक स्थल पर चादर चढ़ाना संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के विरुद्ध है। यह तर्क दिया गया कि ऐसा करना सरकारी संरक्षण और प्रतीकात्मक समर्थन की तरह है, जो भारत की संवैधानिक गरिमा को ठेस पहुंचाता है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को विचार योग्य न मानते हुए खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि इस तरह के प्रतीकात्मक या परंपरागत कार्य न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत नहीं आते।

