बच्चा तस्करी मामला: सुप्रीम कोर्ट ने पति-पत्नी सफाईकर्मी की बर्खास्तगी पर कड़ी आपत्ति, एक घंटे में बहाली का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को वाराणसी नगर निकाय के संविदा नियोक्ता द्वारा पति-पत्नी सफाईकर्मी दंपति को सेवा से हटाए जाने पर कड़ा रुख अपनाया और कहा कि सिर्फ अदालत का दरवाजा खटखटाने पर उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता। अदालत ने दोनों की एक घंटे के भीतर बहाली का निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ को वरिष्ठ अधिवक्ता और अमिकस क्यूरी अपर्णा भट्ट ने बताया कि पीड़िता पिंकी ने याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि बच्चा तस्करी का मामला सुप्रीम कोर्ट में उठाने के बाद उसे और उसके पति को संविदा नियोक्ता ने नौकरी से निकाल दिया।

पीठ ने तीखी टिप्पणी की।
“हम चाहते हैं कि उन्हें एक घंटे के भीतर पुनः नियुक्त किया जाए, अन्यथा संबंधित प्राधिकारी को निलंबित किया जाएगा। हमें अपडेट चाहिए। सिर्फ इसलिए कि वह अदालत आईं, अधिकारी नाराज़ हो गए। हम इसे हल्के में नहीं लेंगे,” न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार के वकील से कहा।

अदालत ने राज्य के वकील से तत्काल संबंधित अधिकारियों को फोन कर यह सुनिश्चित करने को कहा कि दोनों की बहाली तुरंत की जाए।

पिंकी का एक वर्षीय बेटा बहुबली, वाराणसी के नादेसर कैंट इलाके से आधी रात के बाद उसके बगल में सोते समय कथित तौर पर संगठित अंतरराज्यीय तस्करी गिरोह द्वारा उठा लिया गया था।
पिंकी ने अगले दिन वाराणसी कैंट थाने में शिकायत दी, जिसके आधार पर 30 अप्रैल 2023 को एफआईआर दर्ज हुई।

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शुरुआत में मामला गुमशुदगी माना गया, लेकिन आगे की जांच में पता चला कि यह बच्चा तस्करी का मामला है। कई गिरफ्तारियां हुईं और बाद में आरोपियों को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत दे दी। इस आदेश को पिंकी व अन्य ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल को 13 आरोपियों की जमानत रद्द कर दी थी और कहा था कि “न्याय की सामूहिक पुकार और समाज की शांति-सौहार्द की आकांक्षा” को हल्के में नहीं लिया जा सकता। अदालत ने देशभर में बच्चा तस्करी मामलों की सुनवाई तेज करने और सभी हाईकोर्ट को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि ऐसे मुकदमे छह माह में पूरे हों।

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मंगलवार को अपर्णा भट्ट ने बताया कि हाईकोर्ट्स ने छह माह में ट्रायल पूरा करने के लिए सर्कुलर जारी करने का निर्देश पूरा कर दिया है।

अदालत ने उन हाईकोर्ट निर्देशों की अनुपालन स्थिति भी देखी जिनमें यूपी सरकार को कहा गया था कि तस्करी के शिकार बच्चों को RTE कानून 2009 के तहत स्कूलों में दाखिला दिया जाए। राज्य ने बताया कि संबंधित बच्चे अभी पांच वर्ष की आयु नहीं पाए हैं और आयु पूरी होने पर उनका दाखिला कराया जाएगा।

मुआवजे पर, अदालत ने कहा कि जहां ट्रायल पूरा हो चुका है, वहां निचली अदालतें बीएनएसएस 2023 के प्रावधानों और उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मी बाई महिला एवं बाल सम्मान कोष से पीड़ितों को मुआवजा दिला सकती हैं।

पीठ ने कुछ उच्च न्यायालयों द्वारा अधूरी जानकारी दिए जाने पर असंतोष जताया और निर्देश दिया कि सभी हाईकोर्ट संबंधित विवरण संकलित कर शीतावकाश के बाद स्थिति रिपोर्ट दाखिल करें।

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक देव से यह भी पता लगाने को कहा कि क्या किसी अस्पताल से नवजात बच्चों की तस्करी हुई है, और यदि हां, तो उन अस्पतालों पर क्या कार्रवाई की गई। उनसे इसकी रिपोर्ट मांगी गई है।

अदालत ने अपनी 15 अप्रैल की टिप्पणियों को दोहराते हुए कहा कि देश में तस्करी के रूप कई तरह के हो गए हैं और लगातार बढ़ रहे हैं। तस्कर नए तरीके अपना रहे हैं, न्यायिक प्रणाली की कमजोरियों का फायदा उठा रहे हैं और परिवारों को प्रभावित कर रहे हैं।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा गंभीर आरोपों में जमानत देने पर अदालत ने पहले भी नाराजगी जताई थी और कहा था कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, परंतु इसका उपयोग दूसरों के जीवन और स्वतंत्रता को खतरे में डालने के लिए नहीं किया जा सकता।

मामले की अगली सुनवाई शीतावकाश के बाद होगी।

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