सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि हाईकोर्ट की रजिस्ट्री इस बात पर आपत्ति नहीं उठा सकती या स्पष्टीकरण नहीं मांग सकती कि याचिका में विशिष्ट पक्षकारों (Parties) को क्यों शामिल किया गया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल इस आधार पर किसी रिट याचिका को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता कि एक ही प्रार्थना खंड (Prayer Clause) में कई राहतें मांगी गई हैं।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने श्री मुकुंद महेश्वर एवं अन्य बनाम एक्सिस बैंक लिमिटेड एवं अन्य (2026 INSC 84) के मामले में टिप्पणी की कि इस तरह की तकनीकी आपत्तियों को बरकरार रखना हाईकोर्ट द्वारा अपनी “न्यायिक भूमिका का परित्याग” (Abandonment of judicial role) करने जैसा है।
सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें रजिस्ट्री द्वारा उठाई गई कार्यालयी आपत्तियों (Office Objections) के आधार पर एक रिट याचिका को खारिज कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि रजिस्ट्री वादी के इस अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकती कि किसे पक्षकार बनाया जाए।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता, जिन्हें सरफेसी अधिनियम (SARFAESI Act), 2002 की धारा 2(1)(f) के तहत “कर्जदार” (Borrower) के रूप में वर्गीकृत किया गया था, ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत तेलंगाना हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर की थी।
अपनी याचिका में, अपीलकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि अधिनियम की धारा 14 के तहत सुरक्षित संपत्ति का कब्जा लेने के लिए मजिस्ट्रेट द्वारा नियुक्त एक एडवोकेट कमिश्नर ने “धोखाधड़ी और/या सुरक्षित लेनदार (Secured Creditor) के साथ मिलीभगत” करके कार्य किया। उनका तर्क था कि अधिनियम और उसके तहत बनाए गए नियमों का पालन किए बिना कब्जा लिया गया था।
रजिस्ट्री द्वारा उठाई गई आपत्तियां
याचिका प्रस्तुत करने पर, तेलंगाना हाईकोर्ट की रजिस्ट्री ने निम्नलिखित आपत्तियां उठाईं:
- रिट याचिका में प्रार्थना (Prayer) में संशोधन की आवश्यकता है।
- यह स्पष्ट करने की आवश्यकता है कि:
- (क) एक ही प्रार्थना में कई राहतें (Multiple reliefs) क्यों मांगी गई हैं; और
- (ख) प्रतिवादी संख्या 3, 4 और 9 को प्रतिवादी के रूप में क्यों शामिल किया गया है।
- चूंकि याचिका सरफेसी अधिनियम से उत्पन्न हुई है, इसलिए “डीबी सेट आईए याचिका में दायर किया जाना है”।
2 जुलाई 2025 को, इन आपत्तियों के साथ रिट याचिका हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच के समक्ष रखी गई। हाईकोर्ट ने कार्यालय की आपत्तियों से सहमति जताते हुए रिट याचिका को खारिज कर दिया और रजिस्ट्री को कागजात वकील को वापस करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए याचिका को अस्वीकार करने में की गई प्रक्रियात्मक और मौलिक त्रुटियों पर विस्तृत टिप्पणियां कीं।
1. धोखाधड़ी के आरोप: Fraus Omnia Corrumpit
कोर्ट ने एडवोकेट कमिश्नर के खिलाफ धोखाधड़ी के गंभीर आरोपों पर जोर दिया। लैटिन सिद्धांत fraus omnia corrumpit (“धोखाधड़ी सब कुछ उजागर कर देती है”) का हवाला देते हुए, पीठ ने नोट किया:
“ऐसी कार्यवाही को, जहां धोखाधड़ी और मिलीभगत का आरोप लगाया गया हो, महज तकनीकी आधार पर शुरू में ही रोक देना अन्यायपूर्ण है, क्योंकि इससे ऐसे आरोपों को उनके गुणों (Merits) की जांच किए बिना दफन करने की अनुमति मिल जाती है।”
2. एक ही प्रार्थना में कई राहतें
कोर्ट ने एक ही प्रार्थना में कई राहतें मांगने के आधार पर रिट याचिका को खारिज करने को “शायद अभूतपूर्व” (Perhaps unprecedented) बताया।
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश VII नियम 7 का उल्लेख करते हुए, कोर्ट ने समझाया कि आवश्यकता यह है कि राहत को विशेष रूप से बताया जाना चाहिए ताकि अदालत समझ सके कि क्या मांग की जा रही है।
“इसलिए, यह सब इस समझ के बारे में है कि याचिकाकर्ता/वादी अदालत से उसे क्या राहत देने का आग्रह करता है… वे इसके हकदार हैं या नहीं, यह बिल्कुल अलग मामला है।”
कोर्ट ने राहत देने पर कानूनी स्थिति स्पष्ट की:
- कोई अदालत किसी दावे को केवल इसलिए खारिज नहीं कर सकती क्योंकि वादी ने अपनी पात्रता से बड़ी या व्यापक राहत मांगी है।
- यदि वादी कम राहत का हकदार पाया जाता है, तो अदालत उसे वह कम राहत दे सकती है।
- अदालत मांगी गई राहत से बड़ी राहत नहीं दे सकती।
पीठ ने कहा कि यदि हाईकोर्ट का विचार था कि राहत अलग से मांगी जानी चाहिए थी या प्रार्थना खंड दोषपूर्ण था, तो उसे प्रार्थना खंड में सुधार की स्वतंत्रता देनी चाहिए थी या सीपीसी के आदेश VI नियम 17 के तहत संशोधन की अनुमति देनी चाहिए थी।
“यहां तक कि प्रार्थना खंड में संशोधन पर जोर दिए बिना राहत को ढालना (Moulding of relief), यदि इसके लिए कोई मामला बनता है, तो यह रिट न्यायशास्त्र के लिए अज्ञात नहीं है।”
3. पक्षकारों का जुड़ाव: Dominus Litis
सुप्रीम कोर्ट ने रजिस्ट्री द्वारा इस स्पष्टीकरण की मांग पर कड़ी आपत्ति जताई कि प्रतिवादी 3, 4 और 9 को क्यों शामिल किया गया। कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता Dominus Litis (मुकदमे का स्वामी) है।
“यह तय करना उसका काम है कि किसे पक्षकार के रूप में शामिल किया जाए और किसे नहीं। रजिस्ट्री न्यायपालिका के विशेष अधिकार क्षेत्र वाले क्षेत्रों में घुसपैठ नहीं कर सकती और यह स्पष्टीकरण नहीं मांग सकती कि किसी विशेष पक्ष को प्रतिवादी के रूप में क्यों शामिल किया गया है।”
कोर्ट ने नोट किया कि सीपीसी के आदेश I नियम 10 के सिद्धांतों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट द्वारा अनावश्यक पक्षकारों को हटाया जा सकता था, या यदि किसी पक्ष को परेशान करने के लिए शरारतपूर्ण तरीके से शामिल किया गया है, तो हाईकोर्ट न्यायिक पक्ष (Judicial side) पर स्थिति से निपट सकता था।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण पर खेद व्यक्त करते हुए कहा:
“हमें यह बताते हुए पीड़ा हो रही है कि हाईकोर्ट द्वारा अपनी न्यायिक भूमिका का परित्याग किया गया है।”
कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश पारित किए:
- अपील स्वीकार: अपील की अनुमति दी गई और 2 जुलाई 2025 के विवादित आदेश को रद्द कर दिया गया।
- आपत्तियां खारिज: रजिस्ट्री द्वारा उठाई गई आपत्तियों को खारिज कर दिया गया।
- याचिका की बहाली: रिट याचिका को पुनर्जीवित किया गया और इसे “दोष-मुक्त” (Defect-free) के रूप में पंजीकृत और चिह्नित करने का निर्देश दिया गया।
- नई सुनवाई: हाईकोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि वह रिट याचिका को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखे, जिसके बाद इसे विवादित आदेश पारित करने वाली पीठ के अलावा किसी अन्य डिवीजन बेंच को सौंपा जाए।
केस विवरण
- केस टाइटल: श्री मुकुंद महेश्वर एवं अन्य बनाम एक्सिस बैंक लिमिटेड एवं अन्य
- केस नंबर: सिविल अपील (SLP (C) डायरी नंबर 63316 of 2025 से उद्भूत)
- कोरम: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा

