सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश के कुछ राजनीतिक दलों पर चुनावी टिकट बेचने के आरोपों की CBI जांच कराने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता संगठन स्वराज वाहिनी एसोसिएशन को इस मामले में चुनाव आयोग के सामने अपनी लंबित शिकायत को आगे बढ़ाने की छूट दी है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह आदेश दिया। याचिका में सोशल मीडिया पर सामने आए कुछ स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर राजनीतिक दलों के कामकाज और कथित तौर पर चुनावी टिकटों की बिक्री की जांच कराने की मांग की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता संगठन इस मामले में चुनाव आयोग को पहले से दिए गए अपने आवेदन और रिमाइंडर को दोबारा आगे बढ़ा सकता है। बेंच ने भरोसा जताया कि चुनाव आयोग शिकायतों के समाधान के लिए आवश्यक प्रयास करेगा।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट पहले ही इसी मामले में संगठन की जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर चुका है।
चार राजनीतिक दलों को बनाया गया पक्षकार
स्वराज वाहिनी एसोसिएशन ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ स्टिंग ऑपरेशन में उत्तर प्रदेश के राजनीतिक दलों के कामकाज और चुनावी टिकटों की कथित खरीद-फरोख्त से जुड़े मामले सामने आए हैं।
संगठन ने इन आरोपों की CBI से जांच कराने की मांग की थी।
याचिका में चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त और केंद्र सरकार के अलावा उत्तर प्रदेश के चार राजनीतिक दलों को भी पक्षकार बनाया गया था। इनमें निषाद पार्टी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, अपना दल (सोनेलाल) और जन जनवादी पार्टी सोशलिस्ट शामिल हैं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सीधे जांच का आदेश देने के बजाय याचिकाकर्ता को चुनाव आयोग के सामने अपनी शिकायत उठाने की छूट देना उचित समझा।
इलाहाबाद हाईकोर्ट भी खारिज कर चुका है याचिका
इससे पहले 7 सितंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी मामले में दाखिल जनहित याचिका खारिज कर दी थी। उस याचिका में सोशल मीडिया पर प्रसारित स्टिंग ऑपरेशन की जांच CBI या किसी अन्य जांच एजेंसी से कराने की मांग की गई थी।
चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की डिवीजन बेंच ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार करते हुए कहा था कि जनहित याचिका के नाम पर सामने लाए गए हर स्टिंग ऑपरेशन या सोशल मीडिया रिपोर्ट की जांच कराने का निर्देश कोर्ट से देने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।
सुप्रीम कोर्ट ने भी याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। हालांकि, उसने स्वराज वाहिनी एसोसिएशन को चुनाव आयोग के सामने पहले से लंबित अपने आवेदन और रिमाइंडर को फिर से आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता दी।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उसे इस बात पर संदेह करने का कोई कारण नहीं दिखता कि चुनाव आयोग शिकायतों के समाधान के लिए प्रयास नहीं करेगा।

