यदि महिला पहले से शादीशुदा हो तो शादी का वादा कानूनी तौर पर लागू नहीं होता: सुप्रीम कोर्ट ने रेप केस रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने एक वकील के खिलाफ दर्ज रेप के मामले को रद्द करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि पीड़िता पहले से विवाहित है, तो “शादी का झूठा वादा” (False Promise of Marriage) का आधार नहीं बनाया जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि ऐसी स्थिति में महिला शादी के लिए पात्र ही नहीं थी, इसलिए शादी का वादा कानूनी रूप से लागू करने योग्य नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पार्टियों के बीच संबंध सहमति पर आधारित (Consensual) प्रतीत होते हैं जो बाद में खराब हो गए, जिसके परिणामस्वरूप आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग किया गया।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने प्रमोद कुमार नवरत्न द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एफआईआर को खारिज करने से इनकार कर दिया गया था।

कानूनी मुद्दा और परिणाम

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(n) (एक ही महिला के साथ बार-बार बलात्कार) के तहत अपराध तब बनता है, जब पीड़िता एक विवाहित महिला हो (जिसका तलाक का मामला लंबित हो) और वह आरोप लगाए कि शादी के झूठे वादे पर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए गए।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आरोपों को अगर सही भी मान लिया जाए, तो भी रेप का अपराध नहीं बनता है। कोर्ट ने बिलासपुर के जिला एवं सत्र न्यायाधीश के समक्ष लंबित एफआईआर नंबर 213/2025 और संबंधित सत्र मामले (Sessions Case No. 89/2025) को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 6 फरवरी 2025 को दर्ज एक एफआईआर से संबंधित है। शिकायतकर्ता (प्रतिवादी संख्या 3), जो पेशे से एक वकील हैं, ने आरोप लगाया कि वह 18 सितंबर 2022 को एक सामाजिक कार्यक्रम में अपीलकर्ता (जो भी एक वकील हैं) से मिली थीं। शिकायतकर्ता का कहना था कि उन्होंने अपीलकर्ता को अपने लंबित तलाक के मामले के बारे में बता दिया था, इसके बावजूद अपीलकर्ता ने शादी का झांसा देकर उनके साथ शारीरिक संबंध बनाए।

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि अपीलकर्ता ने उनकी मांग में सिंदूर भरा और शादी का वादा किया, लेकिन जब उन्हें गर्भावस्था के बारे में पता चला तो वह बात टालने लगे और कथित तौर पर गर्भपात के लिए मजबूर किया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि 27 जनवरी 2025 को जब वह अपीलकर्ता के घर गईं, तो उनके परिवार ने उनके साथ मारपीट की।

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इसके विपरीत, अपीलकर्ता ने एफआईआर दर्ज होने वाले दिन ही पुलिस अधीक्षक को शिकायत दी थी, जिसमें उन्होंने शिकायतकर्ता पर ब्लैकमेलिंग और उत्पीड़न का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि वे केवल सहकर्मी और मित्र थे और उन्होंने कभी शादी का इरादा नहीं जताया था।

अपीलकर्ता ने एफआईआर रद्द करने के लिए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि हाईकोर्ट ने 3 मार्च 2025 को उन्हें अग्रिम जमानत दे दी थी, यह देखते हुए कि संबंध सहमति से थे, लेकिन एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट का कहना था कि “तथ्य की गलतफहमी या शादी का बहाना जांच का विषय है।”

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से: वकील ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता 33 वर्षीय विवाहित महिला हैं, उनका 10-11 साल का बेटा है और वह पेशे से वकील हैं। उन्होंने अपनी वैवाहिक स्थिति जानते हुए भी स्वेच्छा से शारीरिक संबंध बनाए। दलील दी गई कि उन्हें “शादी के बहाने धोखा” नहीं दिया जा सकता क्योंकि वह कानूनी रूप से शादी करने के लिए सक्षम ही नहीं थीं। यह भी कहा गया कि संबंध जनवरी 2025 तक जारी रहे, जो सहमति को दर्शाता है।

राज्य और शिकायतकर्ता की ओर से: राज्य के वकील ने तर्क दिया कि यह अपराध जघन्य है। व्हाट्सएप चैट का हवाला देते हुए कहा गया कि अपीलकर्ता ने एक “सुनियोजित तरीके” से शिकायतकर्ता को शादी का झूठा झांसा देकर अपनी हवस पूरी करने के लिए प्रेरित किया।

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शिकायतकर्ता के वकील ने कहा कि पुलिस जांच में प्रथम दृष्टया मामला पाया गया है और आरोप पत्र (Charge sheet) दाखिल किया जा चुका है। यह तर्क दिया गया कि अपीलकर्ता एक वकील होने के नाते अपने कार्यों के कानूनी परिणामों को समझते थे और सहमति की गुणवत्ता का निर्णय ट्रायल के चरण में होना चाहिए।

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 376(2)(n) और “शादी के झूठे वादे” द्वारा दूषित “सहमति” की अवधारणा का विस्तृत विश्लेषण किया।

1. शादी पर कानूनी रोक: कोर्ट ने जोर देकर कहा कि कथित अपराध की तारीखों पर शिकायतकर्ता शादी के लिए पात्र नहीं थीं। पीठ ने कहा:

“इसलिए, तर्क के लिए, यदि प्रतिवादी संख्या 1 (राज्य) और शिकायतकर्ता की इस दलील को स्वीकार भी कर लिया जाए कि शादी का झूठा वादा किया गया था… तो भी ऐसा वादा कानूनी रूप से लागू करने योग्य नहीं होगा और न ही उस पर अमल किया जा सकता था क्योंकि पीड़िता स्वयं शादी के लिए पात्र नहीं थी…”

पीठ ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5(i) का उल्लेख किया, जो जीवित पति/पत्नी के रहते हुए दूसरी शादी को प्रतिबंधित करती है।

2. सहमति से बने संबंध बनाम रेप: कोर्ट ने पाया कि तथ्य स्पष्ट रूप से “सहमति से बने रिश्ते के खराब होने” की ओर इशारा करते हैं। जजों ने शिकायतकर्ता के दावों में विरोधाभास की ओर इशारा किया:

“…शिकायतकर्ता ने शुरुआती मुलाकातों में ही आरोपी-अपीलकर्ता को बता दिया था कि वह एक विवाहित महिला है और फैमिली कोर्ट में तलाक की कार्यवाही लंबित है। इसलिए, एक ही सांस में, उन्हें यह दावा करने और आरोप लगाने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि आरोपी ने शादी के झूठे बहाने उन्हें शारीरिक संबंध बनाने के लिए उकसाया, क्योंकि ये दोनों तथ्य एक साथ नहीं टिक सकते…”

3. शिकायतकर्ता का पेशेवर दर्जा: कोर्ट ने शिकायतकर्ता के पेशे का संज्ञान लेते हुए कहा:

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“यह उल्लेख करना अनुचित नहीं होगा कि शिकायतकर्ता स्वयं एक वकील है और इसलिए उसे पहले से ही बोझिल राज्य मशीनरी को एक अनिश्चित आपराधिक मुकदमे में लगाने से पहले अपनी विवेकबुद्धि का प्रयोग करना चाहिए था।”

4. न्यायिक मिसालें: कोर्ट ने कई पूर्व निर्णयों का हवाला दिया:

  • नईम अहमद बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) (2023): “झूठे वादे” (शुरुआत से ही धोखा देने का इरादा) और “वादे के उल्लंघन” (बाद में पूरा करने में असमर्थता) के बीच अंतर स्पष्ट किया।
  • महेश दामू खरे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2024): दोहराया कि वादे को तथ्य की गलतफहमी मानने के लिए, यह शुरुआत से ही झूठा होना चाहिए।
  • प्रशांत बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) (2025): टिप्पणी की कि सहमति से बने रिश्ते का केवल टूट जाना आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का आधार नहीं हो सकता।
  • भजन लाल मामला (1992): एफआईआर रद्द करने के सिद्धांतों को लागू किया।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपों को पूरी तरह स्वीकार करने पर भी धारा 376(2)(n) आईपीसी के तहत रेप का अपराध नहीं बनता है। पीठ ने कहा कि अभियोजन को जारी रहने देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

“हर खराब हुए रिश्ते को रेप के अपराध में बदल देना न केवल अपराध की गंभीरता को कम करता है, बल्कि आरोपी पर अमिट कलंक और घोर अन्याय भी थोपता है।”

तदनुसार, अपील स्वीकार की गई और हाईकोर्ट के आदेश के साथ-साथ एफआईआर और आरोप पत्र को रद्द कर दिया गया।

केस डिटेल्स:

केस टाइटल: प्रमोद कुमार नवरत्न बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य

केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर [संख्या] / 2026 (एस.एल.पी. (क्रिमिनल) नंबर 4452/2025 से उत्पन्न)

कोरम: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां

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