सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि ‘अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958’ (Probation of Offenders Act) की धारा 4 का लाभ उन अपराधियों को भी दिया जा सकता है जिन्हें केवल जुर्माने की सजा सुनाई गई है, न कि कारावास की। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने चार अपीलकर्ताओं की सजा को संशोधित करते हुए उन्हें प्रोबेशन (परिवीक्षा) और ताकीद (Admonition) पर रिहा करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि धारा 12 के तहत इस राहत से उनकी सरकारी सेवा या करियर पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 2 नवंबर 2019 को दिवाली की छुट्टियों के दौरान हुई एक घटना से संबंधित है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, एक 17 वर्षीय किशोरी के साथ अपीलकर्ता नंबर 1 (A-1) ने संबंध बनाने का दबाव बनाया था, जिसका विरोध करने पर विवाद बढ़ गया। बाद में, अपीलकर्ताओं ने किशोरी के पिता पर हमला किया।
बीड़ स्थित विशेष न्यायालय (पॉक्सो) ने अपीलकर्ताओं को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323 और 324 के तहत दोषी ठहराया था। ट्रायल कोर्ट ने A-1, A-2 और A-3 पर ₹500 और ₹2000 का जुर्माना लगाया, जबकि A-4 पर ₹500 का जुर्माना लगाया गया। बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने 26 फरवरी 2024 को इस सजा की पुष्टि की थी। सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ताओं ने दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी, बल्कि केवल 1958 के अधिनियम के तहत राहत की मांग की।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ताओं के वकील: अपीलकर्ताओं की ओर से वकील अमोल बी. करांडे ने तर्क दिया कि 1958 का अधिनियम सजा के “सुधारवादी सिद्धांत” (Reformative Theory) पर आधारित है, जिसका उद्देश्य अपराधी को दंडित करने के बजाय उसे सुधारना है। उन्होंने रतन लाल बनाम पंजाब राज्य और वेद प्रकाश बनाम हरियाणा राज्य जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा कि अदालत का कर्तव्य है कि वह पुनर्वास के दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए तथ्यों का आकलन करे।
राज्य सरकार के वकील: राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि धारा 4 का उद्देश्य अपराधी को जेल के हानिकारक प्रभावों से बचाना है। चूंकि अपीलकर्ताओं को जेल की सजा मिली ही नहीं है और केवल जुर्माना लगाया गया है, इसलिए धारा 4 लागू करने का आधार ही मौजूद नहीं है।
कोर्ट का कानूनी विश्लेषण
अदालत ने इस प्रश्न पर विचार किया कि क्या केवल जुर्माना होने पर धारा 4 के तहत ‘रिहाई’ संभव है। कोर्ट ने माना कि 1958 का अधिनियम एक “हितकारी कानून” (Beneficial Legislation) है और इसकी व्याख्या उद्देश्यों को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए।
सजा की परिभाषा: पीठ ने IPC की धारा 53 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 4 का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘जुर्माना’ भी सजा के दायरे में आता है। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“चूंकि 1958 के अधिनियम की धारा 3 और 4 उन अपराधों पर लागू होती हैं जिनके लिए आईपीसी या किसी अन्य कानून में सजा निर्धारित है, इसलिए इन प्रावधानों का विस्तार स्वाभाविक रूप से जुर्माने वाली सजाओं तक भी होगा।”
‘रिहाई’ शब्द की व्याख्या: राज्य की इस दलील को खारिज करते हुए कि बिना हिरासत के रिहाई नहीं हो सकती, कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“‘रिहाई’ का अर्थ केवल हिरासत से रिहाई नहीं है। इसे जुर्माने की सजा भुगतने की बाध्यता से मुक्ति के रूप में पढ़ा जाना चाहिए… धारा 4 में ‘रिहाई’ का अर्थ अपराधी को सजा प्राप्त करने से मुक्त करना है, चाहे वह सजा केवल जुर्माने की ही क्यों न हो।”
सुधारवादी दृष्टिकोण: अदालत ने जोर दिया कि इस कानून का मकसद अपराधियों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाना है ताकि वे बिना किसी “कलंक” के सम्मान के साथ रह सकें। कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता नंबर 1 और 4 सरकारी कर्मचारी हैं और उनका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों की सजा को बरकरार रखा लेकिन सजा के स्वरूप को निम्न प्रकार से बदल दिया:
- A-1, A-2 और A-3: इन्हें 1958 अधिनियम की धारा 4(1) का लाभ दिया गया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि उन्हें सजा देने के बजाय एक वर्ष के लिए शांति और अच्छे व्यवहार का बॉन्ड भरने पर रिहा किया जाए। इस दौरान वे प्रोबेशन अधिकारी की निगरानी में रहेंगे।
- A-4: इन्हें अधिनियम की धारा 3 का लाभ देते हुए उचित ताकीद (Admonition) के बाद रिहा करने का निर्देश दिया गया।
- मुआवजा: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपीलकर्ताओं द्वारा जमा किया गया जुर्माना पीड़ित पक्ष को मुआवजे के रूप में दिया जाएगा।
- सेवा करियर पर प्रभाव: धारा 12 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“चूंकि सभी अपीलकर्ताओं को धारा 3 और 4 का लाभ दिया गया है, इसलिए इस दोषसिद्धि के कारण उनके सेवा करियर (Service Career) पर कोई अयोग्यता या प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।”
केस डिटेल्स ब्लॉक
- केस टाइटल: मिलिंद बनाम महाराष्ट्र राज्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 2026 (SLP (Crl.) No. 6843/2024 से उत्पन्न)
- पीठ: जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
- तारीख: 10 अप्रैल, 2026

