देश भर के नेशनल और स्टेट हाईवे पर आवारा पशुओं के कारण होने वाले हादसों और सुरक्षा चिंताओं पर संज्ञान लेते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अधिकारियों से पूछा है कि हाईवे को पशु-मुक्त बनाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले में केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है।
यह कानूनी कार्रवाई ‘लॉयर्स फॉर ह्यूमन राइट्स इंटरनेशनल’ द्वारा दायर एक याचिका के बाद शुरू हुई है। याचिका में तर्क दिया गया है कि हाईवे पर पशुओं की मौजूदगी न केवल इंसानों की सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि यह पशु कल्याण के दृष्टिकोण से भी गंभीर मुद्दा है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि प्रशासन को इसके लिए ‘यूनिफॉर्म नेशनल गाइडलाइंस’ (समान राष्ट्रीय दिशा-निर्देश) बनाने और उन्हें सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया जाए।
याचिका में विशेष रूप से नेशनल हाईवे और एक्सप्रेसवे पर अनिवार्य फेंसिंग (बाड़ लगाना) की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं ने जोर दिया कि “दुर्घटना संभावित क्षेत्रों” (accident-prone stretches) में ऐसे उपाय बेहद जरूरी हैं, क्योंकि तेज रफ्तार वाहनों और पशुओं की टक्कर में अक्सर जानलेवा हादसे होते हैं।
पशुओं को सड़कों से हटाने के अलावा, याचिका में इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए कई सुझाव दिए गए हैं। इसमें ‘साइंटिफिक तरीके से संचालित’ गौशालाओं और पशु आश्रय गृहों की स्थापना की मांग की गई है, जिनके लिए अलग से फंड आवंटित किया जाए ताकि उनकी स्थिति बेहतर बनी रहे।
पशुओं को लावारिस छोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए, याचिका में उन लोगों पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई की मांग की गई है जो अपने पशुओं को अवैध रूप से सड़कों पर छोड़ देते हैं। इसके साथ ही, आवारा पशुओं के कारण होने वाले हादसों के पीड़ितों को आर्थिक राहत देने के लिए एक ‘नो-फॉल्ट मुआवजा ढांचा’ (no-fault compensation framework) तैयार करने का भी प्रस्ताव दिया गया है, ताकि इन त्रासदियों का पूरा बोझ केवल प्रभावित नागरिकों पर न पड़े।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले पर विचार करना भारत के विस्तृत होते हाईवे नेटवर्क को सुरक्षित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

