संपत्ति अधिकारों से जुड़े गैर-हस्ताक्षरकर्ता भी मध्यस्थता में वास्तविक पक्षकार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि यदि किसी विवाद के समाधान से अचल संपत्ति पर गैर-हस्ताक्षरकर्ताओं (नॉन-सिग्नेटरीज) के अधिकार सीधे प्रभावित होते हैं, तो उन्हें मध्यस्थता के रेफरल चरण में “वास्तविक पक्षकार” (वेरिटेबल पार्टी) के रूप में शामिल किया जा सकता है। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11 के तहत दिए गए हाईकोर्ट के आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए यह निर्णय दिया। पीठ ने कहा कि यद्यपि प्रतिवादी संख्या 3 और 4 वर्ष 1985 की मूल पार्टनरशिप डीड के हस्ताक्षरकर्ता नहीं थे, फिर भी वे प्रथम दृष्टया मामले में वास्तविक पक्षकार हैं क्योंकि विवादित संपत्ति पर उनका दावा कथित तौर पर फर्जी पाए गए रिटायरमेंट डीड की वैधता से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका यह निष्कर्ष केवल प्रथम दृष्टया (प्राइमा फेसी) है और अंतिम निर्णय, परिसीमा (लिमिटेशन) तथा विबंधन (एस्ट्रोपेल) से जुड़े प्रश्नों पर विचार करने का अधिकार मध्यस्थ न्यायाधिकरण (आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल) के पास खुला रहेगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मुंबई के वर्ली स्थित डॉ. एनी बेसेंट रोड पर मनीष कमर्शियल सेंटर के भूतल पर स्थित 3,500 वर्ग फुट की अचल संपत्ति (यूनिट नंबर 2) से संबंधित है, जिसे फैसले में ‘सब्जेक्ट एसेट’ कहा गया है। यह संपत्ति मूल रूप से मैसर्स प्रॉस्पेक्टिव ट्रेडर्स नामक पार्टनरशिप फर्म द्वारा 3 अक्टूबर 1977 को खरीदी गई थी। इस फर्म का गठन 2 अप्रैल 1977 को वी. यू. शाह, एन. यू. शाह और सी. यू. शाह के तीन पारिवारिक ट्रस्टों के बीच हुआ था।

9 दिसंबर 1985 को फर्म का पुनर्गठन किया गया, जिसके तहत अपीलकर्ता—हेमंत डी. शाह एचयूएफ और हेमंत डी. शाह की पत्नी—तथा प्रतिवादी संख्या 1 और 2—चित्तरंजन डी. शाह एचयूएफ और सी. डी. शाह की पुत्रवधू—को नए साझेदार के रूप में शामिल किया गया। इसके बाद 30 दिसंबर 1987 को एक अन्य डीड के जरिए मूल ट्रस्टी साझेदार फर्म से अलग हो गए।

विवाद का मुख्य केंद्र 3 जुलाई 1995 की एक रिटायरमेंट डीड है, जिसके अनुसार अपीलकर्ताओं का फर्म से रिटायर होना दर्शाया गया था। अपीलकर्ताओं ने इस दस्तावेज को पूरी तरह से फर्जी बताया। बाद में, 1 जुलाई 2005 को प्रतिवादी संख्या 2 भी फर्म से अलग हो गईं, जिससे फर्म का विघटन हो गया और वह प्रतिवादी संख्या 1 के स्वामित्व वाली एकल स्वामित्व (प्रोपराइटरशिप) फर्म बन गई। इसके बाद 30 सितंबर 2009 को प्रतिवादी संख्या 1 ने प्रतिवादी संख्या 3 और 4 को साझेदार के रूप में शामिल किया। 4 नवंबर 2009 को प्रतिवादी संख्या 1 के रिटायर होने के बाद प्रतिवादी संख्या 3 और 4 ही फर्म और विवादित संपत्ति के नियंत्रक साझेदार बने रहे।

अपीलकर्ताओं की पहल पर पहले दिया गया एक मध्यस्थता पंचाट (आर्बिट्रल अवार्ड) धारा 34 के तहत रद्द कर दिया गया था। इसके बाद अपीलकर्ताओं ने नए मध्यस्थ की नियुक्ति और प्रतिवादियों को शामिल करने के लिए हाईकोर्ट में धारा 11 के तहत अर्जी दाखिल की। हाईकोर्ट ने अपीलकर्ताओं के पक्ष में परिसीमा का मुद्दा तय किया, लेकिन प्रतिवादी संख्या 3 और 4 को मध्यस्थता में शामिल करने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट का मानना था कि वे मध्यस्थता समझौते के हस्ताक्षरकर्ता नहीं हैं और न ही ‘ग्रुप ऑफ कंपनीज’ सिद्धांत या किसी हस्ताक्षरकर्ता के माध्यम से दावा करने वाले अपवादों के दायरे में आते हैं।

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पक्षकारों की दलीलें

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपीलकर्ताओं के वकील श्री आशिम सूद ने दलील दी कि प्रतिवादी संख्या 3 और 4 को मध्यस्थता में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अपीलकर्ता कभी फर्म से रिटायर नहीं हुए थे और 1995 की रिटायरमेंट डीड पूरी तरह से जाली दस्तावेज है, इसलिए मूल साझेदारी और संपत्ति पर उसका अधिकार आज भी बरकरार है।

इसके विपरीत, प्रतिवादी संख्या 1 और 2 की ओर से पेश वकील श्री संजय सरीन ने तर्क दिया कि अपीलकर्ताओं के हटने के बाद जब प्रतिवादी संख्या 2 रिटायर हुईं, तो फर्म पूरी तरह से समाप्त (डिसॉल्व) हो गई थी। वहीं, प्रतिवादी संख्या 3 और 4 के वरिष्ठ वकील श्री रितिन राय ने कहा कि उनके मुवक्किलों का 9 दिसंबर 1985 के पार्टनरशिप एग्रीमेंट से कोई लेना-देना नहीं है जिसमें मध्यस्थता खंड शामिल था; वे गैर-हस्ताक्षरकर्ता हैं और बाद में किए गए नए समझौतों के तहत शामिल हुए थे।

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कोर्ट का विश्लेषण और पूर्व नज़ीरें

फैसला सुनाते हुए जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने शुरुआत में ही यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की: “‘गठित मध्यस्थता में ‘वास्तविक पक्षकार’ एक ऐसा पेचीदा सवाल है जो बार-बार सामने आता है, जिसे तथ्यों और उससे उत्पन्न होने वाले कई पहलुओं के आधार पर ही तय किया जाना चाहिए, और इसे किसी बंधे-बंधाए फॉर्मूले में नहीं ढाला जा सकता।'”

सुप्रीम कोर्ट ने गैर-हस्ताक्षरकर्ताओं से जुड़े सिद्धांतों पर चर्चा करते हुए कॉक्स एंड किंग्स लिमिटेड बनाम एसएपी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य (2024) तथा हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड बनाम बीसीएल सिक्योर प्रेमिसेस प्राइवेट लिमिटेड (2026) के फैसलों का हवाला दिया।

पीठ ने स्पष्ट किया कि हालांकि कॉक्स एंड किंग्स लिमिटेड में विवेचित ‘ग्रुप ऑफ कंपनीज’ का सिद्धांत यहां सीधे लागू नहीं होता, लेकिन उसमें प्रतिपादित कानूनी सिद्धांत इस विवाद को हल करने में मदद करते हैं। कोर्ट ने रेखांकित किया कि मध्यस्थता कानून में अदालतें ऐसा कठोर रुख नहीं अपना सकतीं जिससे उन लोगों को बाहर कर दिया जाए जिनका आचरण और हस्ताक्षरकर्ताओं के साथ संबंध मध्यस्थता समझौते से बंधे होने की मंशा को दर्शाता है। कोर्ट ने कॉक्स एंड किंग्स लिमिटेड के पैरा 132 को उद्धृत करते हुए कहा:

“‘समग्र कारकों को देखने पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि गैर-हस्ताक्षरकर्ता, हस्ताक्षरकर्ता पक्षकारों के साथ अपने संबंधों और विषय-वस्तु से जटिल रूप से जुड़े वाणिज्यिक दायित्वों के निर्वहन में अपनी सक्रिय भागीदारी के कारण, वास्तव में हस्ताक्षरकर्ता पक्षों के बीच के विवाद से अनजान या अजनबी नहीं हैं।'”

इसके अलावा, पीठ ने यह भी दोहराया कि धारा 7 के तहत लिखित समझौते की अनिवार्यता गैर-हस्ताक्षरकर्ताओं को बाध्य करने की संभावना को समाप्त नहीं करती, और रेफरल कोर्ट को यह जांचना होता है कि क्या कोई गैर-हस्ताक्षरकर्ता प्रथम दृष्टया वास्तविक पक्षकार है।

तथ्यों का विश्लेषण करते हुए पीठ ने माना कि पूरा विवाद अचल संपत्ति के मालिकाना हक के इर्द-गिर्द घूमता है। यदि 3 जुलाई 1995 की रिटायरमेंट डीड अवैध या फर्जी पाई जाती है, तो पक्षकार स्वतः 9 दिसंबर 1985 की पार्टनरशिप डीड की स्थिति में लौट आएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“‘ऐसी स्थिति में, यह प्रतिवादी संख्या 3 और 4 के अधिकारों को प्रभावित करेगा, जिन्हें प्रतिवादी संख्या 1 द्वारा साझेदार के रूप में शामिल किया गया था और जिन्होंने उस पार्टनरशिप डीड के माध्यम से ‘सब्जेक्ट एसेट’ पर अधिकार प्राप्त किए थे, जिसमें न तो अपीलकर्ता और न ही प्रतिवादी संख्या 1 और 2 साझेदार हैं। मध्यस्थता के लिए उठाया गया विवाद ‘सब्जेक्ट एसेट’ के मालिकाना हक के इर्द-गिर्द घूमता है; चाहे वह 09.12.1985 की डीड के तहत हो या 04.11.2009 की डीड के तहत।'”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रतिवादी संख्या 3 और 4 इस विवाद में वास्तविक पक्षकार हैं, क्योंकि विवादित संपत्ति पर उनका दावा तभी वैध हो सकता है जब अपीलकर्ताओं की कथित रिटायरमेंट डीड वैध पाई जाए।

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तदनुसार, कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को आंशिक रूप से संशोधित करते हुए प्रतिवादी संख्या 3 और 4 को भी मध्यस्थता में वास्तविक पक्षकार माना, भले ही वे 9 दिसंबर 1985 की पार्टनरशिप डीड के हस्ताक्षरकर्ता न रहे हों।

पीठ ने साथ ही सचेत करते हुए कहा: “‘हम यह स्पष्ट करते हैं कि प्रतिवादी संख्या 3 और 4 के वास्तविक पक्षकार होने का हमारा निष्कर्ष एक प्रथम दृष्टया निष्कर्ष है, जो उक्त मुद्दे के अंतिम निर्णय, परिसीमा के मुद्दे या प्रतिवादी संख्या 3 और 4 द्वारा अपीलकर्ताओं के खिलाफ उठाए गए विबंधन (एस्ट्रोपेल) के आधार को प्रभावित नहीं करेगा; यह बिंदु जीवित रहेगा और मध्यस्थ न्यायाधिकरण द्वारा विचार किए जाने के लिए खुला रहेगा।'”

इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील का निस्तारण कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: हेमंत डी. शाह एचयूएफ एवं अन्य बनाम चित्तरंजन डी. शाह एचयूएफ एवं अन्य

वाद संख्या: एसईएलपी (सिविल) संख्या 26474 / 2026

पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन 

निर्णय की तिथि: 12 अक्टूबर 2026

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