गौहाटी हाईकोर्ट ने असम के एक व्यक्ति को 25 मार्च 1971 के बाद का विदेशी घोषित करने वाले फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए देश में निरंतर निवास करना एक अनिवार्य शर्त है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी और संबंधित व्यक्ति को पूर्व में दी गई जमानत भी निरस्त कर दी।
जस्टिस कल्याण राय सुराणा और जस्टिस सुस्मिता फुकन खौंड की खंडपीठ ने 8 अक्टूबर को यह फैसला सुनाया। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता मतदाता सूचियों में मौजूद विसंगतियों और भारी अंतर के कारण अपने पिता और दादा के साथ वंशानुगत संबंध साबित करने में विफल रहा। अदालत ने टिप्पणी की कि 1966 के बाद से याचिकाकर्ता के दादा के भारत में लगातार रहने का कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं है और इस कमी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मतदाता सूचियों में विसंगतियां और 20 साल का लंबा अंतराल
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि 1977 और 1997 की मतदाता सूचियों के बीच 20 वर्ष का एक बड़ा अंतर मौजूद है, जिसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। अदालत ने रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता का नाम पहली बार 1997 की मतदाता सूची में दर्ज हुआ, जब उसकी उम्र 26 वर्ष थी, जबकि वह 21 वर्ष की आयु में ही मतदान के योग्य हो चुका था।
अदालत ने यह भी दर्ज किया कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत मतदाता सूचियां अलग-अलग गांवों से जुड़ी थीं और उनमें दर्ज नामों में भी विरोधाभास था। वर्ष 1966 की मतदाता सूची में याचिकाकर्ता के पिता का नाम कुरफान अली और दादा का नाम जान महमूद दर्ज था, जबकि बाद की सूचियों में यही नाम बदलकर क्रमशः कुरपान अली और जानू मिया दर्ज पाए गए।
हाईकोर्ट ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के इस आकलन से सहमति जताई कि 1977 की मतदाता सूची किसी अन्य परिवार से संबंधित प्रतीत होती है। इसके अलावा, अदालत ने यह भी चिन्हित किया कि याचिकाकर्ता ने अपनी जन्मतिथि, जन्मस्थान और अपनी मां व भाई-बहनों के नाम का खुलासा नहीं किया था। वर्ष 2018 के ट्रिब्यूनल आदेश में भी यह दर्ज था कि उसने अपने दादा-दादी के जन्मस्थान और दादा के भाई-बहनों के नाम की जानकारी नहीं दी थी।
ब्रह्मपुत्र के कटाव और विस्थापन की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील एन. उद्दीन ने दलील दी कि ट्रिब्यूनल ने वैध सार्वजनिक दस्तावेजों को गलत तरीके से खारिज किया। उन्होंने दावा किया कि 1970 की मतदाता सूची में माता-पिता और दादा-दादी दोनों के नाम मौजूद थे, जिससे कानूनी रिश्ता स्थापित होता है। उन्होंने यह भी तर्क रखा कि याचिकाकर्ता के पिता ने अदालत में गवाह के तौर पर बयान दिया था और पिता की भारतीय नागरिकता पुत्र के दावे की पुष्टि करती है।
अलग-अलग गांवों की मतदाता सूचियों के संबंध में याचिकाकर्ता ने बताया कि ब्रह्मपुत्र नदी के कटाव के कारण उसके परिवार को कई बार विस्थापन का सामना करना पड़ा। याचिका के अनुसार, उसका जन्म निज-परुवा गांव में हुआ था। इसके बाद नदी किनारे जमीन धंसने के चलते परिवार चंपुपारा पाथर चला गया। वर्ष 1970 के बाद वे उजान दुरामारी स्थानांतरित हुए और फिर 1997 के बाद दुरामारी (दीघलचुरा) से भीतर दुआर गांव आ गए, जहां वे वर्तमान में रह रहे हैं।
दस्तावेजी साक्ष्य के अभाव में मौखिक गवाही अपर्याप्त
याचिका का विरोध करते हुए सरकारी वकील जी. शर्मा ने अदालत में कहा कि याचिकाकर्ता के पिता का मौखिक बयान किसी ठोस दस्तावेजी साक्ष्य से प्रमाणित नहीं होता, इसलिए केवल बयान के आधार पर नागरिकता साबित नहीं मानी जा सकती। सरकार का पक्ष था कि याचिकाकर्ता अपने पिता और दादा के बीच कोई सत्यापन योग्य संबंध साबित करने में असमर्थ रहा है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की इस दलील को स्वीकार करते हुए फैसला सुनाया कि भले ही नदी कटाव के कारण परिवार को तीन अलग-अलग गांवों में बसना पड़ा हो, तब भी उपलब्ध चुनावी दस्तावेज उसके माता-पिता और दादा-दादी के साथ अनिवार्य रिश्ते को प्रमाणित नहीं करते। इसके साथ ही अदालत ने सितंबर 2018 के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया।

