नियोक्ता द्वारा प्रदान किए गए समूह बीमा लाभ को मोटर दुर्घटना मुआवजे से घटाना गलत: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत दिए जाने वाले मुआवजे से उस राशि की कटौती नहीं की जा सकती जो मृतक के आश्रितों को नियोक्ता द्वारा प्रदान की गई ग्रुप इंश्योरेंस (समूह बीमा) योजना या अन्य संविदात्मक सामाजिक सुरक्षा लाभों के तहत प्राप्त हुई हो।

जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उन फैसलों पर अपनी मुहर लगा दी है, जिनमें मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) द्वारा समूह बीमा राशि की कटौती करने के आदेश को रद्द कर दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

न्यायालय के समक्ष दो अलग-अलग अपीलें (सिविल अपील संख्या 5490-5491/2025 और 5492-5493/2025) थीं, जिनमें कानूनी मुद्दा एक समान था।

पहले मामले में, एक्सेंचर (Accenture) में टीम मैनेजर के पद पर कार्यरत पी. विश्वेश्वर की 30 जुलाई 2018 को एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। उनकी मोटरसाइकिल को KSRTC की एक बस ने टक्कर मार दी थी। MACT बेंगलुरु ने ₹69,07,710 का मुआवजा निर्धारित किया, लेकिन इसमें से समूह बीमा के रूप में प्राप्त ₹35,48,000 घटा दिए। हाईकोर्ट ने बाद में इस कटौती को गलत ठहराते हुए रद्द कर दिया था।

दूसरे मामले में, ‘कॉक्स एंड किंग्स लिमिटेड’ में सहायक प्रबंधक के रूप में कार्यरत सेलेस्टीन डिसूजा की 20 जनवरी 2015 को बस की चपेट में आने से मृत्यु हो गई थी। न्यायाधिकरण ने ₹63,04,878 का मुआवजा तय किया, लेकिन नियोक्ता द्वारा प्रदान की गई समूह बीमा योजना के तहत मिले ₹10,00,000 की कटौती कर दी। हाईकोर्ट ने इस राशि को संशोधित करते हुए बिना किसी कटौती के ₹59,95,944 का मुआवजा निर्धारित किया।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं (KSRTC और बीमा कंपनी) का मुख्य तर्क यह था कि:

  • मृतक वाहन चालकों की भी दुर्घटना में लापरवाही थी, इसलिए मुआवजे की राशि कम की जानी चाहिए।
  • दावेदारों को एक ही दुर्घटना के लिए दो अलग-अलग स्रोतों से लाभ (Double recovery) नहीं मिलना चाहिए। उनका तर्क था कि नियोक्ता द्वारा दिए गए बीमा लाभों को मुआवजे से काटा जाना अनिवार्य है।

वहीं, उत्तरदाताओं (दावेदारों) ने तर्क दिया कि:

  • दुर्घटना पूरी तरह से बस चालकों की लापरवाही के कारण हुई थी।
  • बीमा लाभ या नियोक्ता द्वारा दी गई सहायता राशि मोटर दुर्घटना मुआवजे से स्वतंत्र है क्योंकि यह एक अलग संविदात्मक संबंध (Contractual relation) से उत्पन्न होती है, इसलिए इसे काटा नहीं जा सकता।

न्यायालय का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर विचार किया कि क्या नियोक्ता द्वारा बिना कर्मचारी के अंशदान के प्रदान की गई समूह बीमा योजना का लाभ ‘आर्थिक लाभ’ (Pecuniary advantage) की श्रेणी में आता है जिसे मुआवजे से घटाया जा सके।

न्यायालय ने हेलेन सी. रेबेलो बनाम महाराष्ट्र राज्य सड़क परिवहन निगम और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम पेट्रीसिया जीन महाजन जैसे पिछले निर्णयों का हवाला दिया। पीठ ने कहा कि “हानि और लाभ” के संतुलन का सिद्धांत केवल तभी लागू होता है जब प्राप्त राशि का दुर्घटना में हुई मृत्यु से सीधा संबंध हो।

सेबस्टियानी लकड़ा बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड मामले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा:

“कानून स्पष्ट रूप से स्थापित है कि मुआवजे की राशि से बीमा, पेंशन लाभ, ग्रेच्युटी या मृतक के परिजनों को दी गई नौकरी के आधार पर कोई कटौती नहीं की जा सकती। इसका मुख्य कारण यह है कि ये सभी राशियाँ मृतक द्वारा दूसरों के साथ किए गए संविदात्मक संबंधों के कारण अर्जित की गई होती हैं।”

पीठ ने आगे स्पष्ट किया कि इन दो प्रकार के भुगतानों के बीच कोई संबंध नहीं है:

“ऐसे लाभ एक स्वतंत्र संविदात्मक संबंध से उत्पन्न होते हैं और मोटर वाहन दुर्घटना में मृत्यु के लिए देय वैधानिक मुआवजे के साथ इनका कोई आवश्यक संबंध नहीं है। इसलिए, मुआवजे को कम करने के लिए ‘हानि और लाभ’ के संतुलन के सिद्धांत का सहारा नहीं लिया जा सकता।”

बस चालक को पक्षकार न बनाने जैसे प्रक्रियात्मक आक्षेपों पर कोर्ट ने दोहराया कि मोटर वाहन अधिनियम सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने वाला एक “हितकारी प्रावधान” है और प्रक्रिया की कठोरता को इसके उद्देश्य को विफल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने KSRTC और बीमा कंपनी द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट के आदेशों की पुष्टि की। न्यायालय ने अपीलकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे निर्धारित मुआवजा राशि छह सप्ताह के भीतर जमा करें।

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अदालत ने इस मामले में श्री रोहित शर्मा द्वारा ‘एमिकस क्यूरी’ (Amicus Curiae) के रूप में दी गई बहुमूल्य सहायता की भी सराहना की।

मामले का विवरण

  • केस का नाम: मैनेजिंग डायरेक्टर, KSRTC बनाम पी. चंद्रमौली एवं अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 5490-5491 ऑफ 2025 (साथ में सी.ए. संख्या 5492-5493 ऑफ 2025)
  • पीठ: जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
  • तारीख: 16 मार्च, 2026

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