सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ, जिसमें जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू शामिल थे, ने मेरठ विकास प्राधिकरण (एमडीए) द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिकाओं (एसएलपी) का निस्तारण करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश में संशोधन किया है। सुप्रीम कोर्ट ने प्राधिकरण को निर्देश दिया है कि वह रेफरेंस कोर्ट द्वारा बढ़ाए गए मुआवजे की पूरी धनराशि चार सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में जमा करे। इसके साथ ही, कोर्ट ने भूस्वामियों को अंतरिम राहत के रूप में दी जाने वाली राशि को कुल बढ़ी हुई धनराशि के 8.33 प्रतिशत तक सीमित कर दिया है और हाईकोर्ट से अनुरोध किया है कि वह लंबित प्रथम अपीलों को प्राथमिकता के आधार पर छह महीने के भीतर तय करे।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद वर्ष 1987 में शताब्दी नगर आवासीय योजना के लिए अधिग्रहित की गई भूमि से जुड़ा है। विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी, मेरठ ने 22 फरवरी 1990 को अपने अवॉर्ड में अधिग्रहित भूमि के लिए 20 रुपये और 27 रुपये प्रति वर्ग गज की दर से मुआवजा तय किया था।
इस निर्णय से असंतुष्ट होकर भूस्वामियों ने कानूनी प्रावधानों के तहत रेफरेंस की मांग की। दशकों बाद, पीठासीन अधिकारी, भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन प्राधिकरण (रेफरेंस कोर्ट), मेरठ ने 30 मार्च 2024 को अपना निर्णय सुनाते हुए संबंधित गांवों के मुआवजे की दर को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाते हुए 690 रुपये और 720 रुपये प्रति वर्ग गज कर दिया।
हाईकोर्ट की कार्यवाही और पक्षकारों की दलीलें
रेफरेंस कोर्ट द्वारा मुआवजे में की गई इस भारी बढ़ोतरी को मेरठ विकास प्राधिकरण ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 54 के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रथम अपीलों के जरिए चुनौती दी।
इन अपीलों के लंबित रहने के दौरान, हाईकोर्ट ने 17 सितंबर 2025 को प्रथम अपील संख्या 717/2025 में अंतरिम आदेश जारी कर रेफरेंस कोर्ट के अवॉर्ड पर इस शर्त के साथ रोक लगा दी कि प्राधिकरण 50 प्रतिशत बढ़ी हुई राशि नकद जमा करे और शेष 50 प्रतिशत के लिए प्रतिभूति (सिक्योरिटी) प्रस्तुत करे। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने दावेदार भूस्वामियों को नकद जमा की गई पूरी 50 प्रतिशत राशि निकालने की अनुमति दे दी, जबकि शेष राशि अपीलों के अंतिम निर्णय पर निर्भर रखी गई।
हाईकोर्ट की इस शर्त से व्यथित होकर मेरठ विकास प्राधिकरण ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। प्राधिकरण की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी. एस. पटवालिया पेश हुए और उन्होंने विभिन्न याचिकाओं से जुड़ी देनदारियों का विवरण दर्शाने वाला एक चार्ट पेश किया, जिसे कोर्ट ने परिशिष्ट-I (अपेंडिक्स-I) के रूप में रिकॉर्ड पर लिया। वहीं संबंधित प्रतिवादी भूस्वामियों की ओर से भी अधिवक्ता उपस्थित हुए।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और पूर्व आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि ये सभी विशेष अनुमति याचिकाएं हाईकोर्ट में पहले से विचाराधीन अपीलों से उपजी हैं, इसलिए इन्हें सुप्रीम कोर्ट में लंबित रखने का कोई औचित्य नहीं है।
अंतरिम राहत के निर्धारण के संदर्भ में, पीठ ने 24 अप्रैल 2026 को समान मामले में पारित एक पूर्व आदेश (स्पेशल लीव पिटीशन (सिविल) संख्या 15370/2026 एवं संबद्ध मामले) का संज्ञान लिया, जिसमें जस्टिस दीपांकर दत्ता भी खंडपीठ के सदस्य थे। उस मामले में लगभग 6 करोड़ रुपये की बढ़ी हुई मुआवजा राशि में से केवल 50 लाख रुपये (लगभग 8.33 प्रतिशत) ही भूस्वामियों को जारी करने की अनुमति दी गई थी। पीठ ने वर्तमान मामले में भी समानता बनाए रखने का निर्णय लिया।
मामले की लंबी कानूनी प्रक्रिया पर चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट में अपीलों की धीमी गति पर खेद प्रकट किया:
“अंतिम बात कहने से पहले, हम हाईकोर्ट में लंबित प्रथम अपीलों पर जिस गति से विचार किया जा रहा है, उससे आंखें नहीं मूंद सकते। जैसा कि उल्लेख किया गया है, इस मामले में अधिग्रहण की कार्यवाही वर्ष 1987 की है। हम खेद के साथ यह रेखांकित करते हैं कि पूर्व के आदेश में अपीलों की प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई सुनिश्चित करने के स्पष्ट अनुरोध के बावजूद, हाईकोर्ट सुनवाई के लिए इन्हें नहीं ले सका। जैसा कि दलील दी गई है, अपेक्षित तत्परता का अभाव है। हम हाईकोर्ट की प्रत्येक पीठ पर काम के भारी बोझ से अनभिज्ञ नहीं हैं; फिर भी, एक बार अनुरोध किए जाने के बाद, रोस्टर पीठ से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपीलों पर निर्णय में तेजी लाने का ईमानदार प्रयास करे।”
पीठ ने दोनों पक्षों के हितों को रेखांकित करते हुए आगे टिप्पणी की:
“…इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि रेफरेंस कोर्ट ने मुआवजे में असामान्य रूप से भारी वृद्धि की है, जो एक तरफ याचिकाकर्ता पर भारी वित्तीय दायित्व का बोझ डालती है, तो दूसरी तरफ उत्तरदाताओं (भूस्वामियों) को इस अनिश्चितता में छोड़ देती है कि अंततः किस मुआवजे को अंतिमता प्राप्त होगी।”
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश
याचिकाओं का निस्तारण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- पूरी राशि जमा करने का आदेश: मेरठ विकास प्राधिकरण चार सप्ताह के भीतर रेफरेंस कोर्ट द्वारा बढ़ाई गई पूरी धनराशि इलाहाबाद हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में जमा करेगा।
- 8.33 प्रतिशत का वितरण: जमा होने पर, हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल प्रत्येक प्रतिवादी-भूस्वामी के लिए बढ़ी हुई राशि का 8.33 प्रतिशत अलग करेंगे और नियमानुसार उन्हें वितरित करेंगे।
- अधिकारों का संरक्षण: यह राशि प्राप्त करना लंबित प्रथम अपीलों में पक्षकारों के अधिकारों और दावों को प्रभावित किए बिना होगा। यदि प्राधिकरण की प्रथम अपीलें स्वीकार हो जाती हैं, तो भूस्वामियों को यह राशि प्राधिकरण को लौटानी होगी।
- शेष राशि का निवेश: शेष धनराशि को किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में स्वतः नवीनीकरण (ऑटो-रिन्यूअल) आधार पर ब्याज अर्जित करने वाले सावधि जमा (एफडी) खातों में जमा रखा जाएगा, जो हाईकोर्ट के आगामी आदेशों के अधीन रहेगा।
- छह महीने में निस्तारण का अनुरोध: हाईकोर्ट से अनुरोध किया गया है कि वह शताब्दी नगर आवासीय योजना से जुड़ी प्रथम अपीलों को प्राथमिकता दे और आदेश प्राप्त होने की तिथि से छह महीने के भीतर इन पर शीघ्र निर्णय करे।
- आगे राहत का विकल्प: यदि उचित कारणों से हाईकोर्ट छह महीने में अपीलों का निस्तारण नहीं कर पाता है, तो भूस्वामियों को अतिरिक्त राशि की मांग के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की स्वतंत्रता होगी।
सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को इस आदेश की प्रति इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने का निर्देश दिया गया, ताकि इसे आवश्यक प्रशासनिक दिशा-निर्देशों हेतु मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किया जा सके।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मेरठ विकास प्राधिकरण बनाम परमेश्वर दयाल एवं अन्य
वाद संख्या: स्पेशल लीव पिटीशन (सिविल) संख्या 12994/2026
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू
निर्णय की तिथि: 08 अक्टूबर, 2026

