सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा रिकॉर्ड में की गई “लिपिकीय और मानवीय भूल” (Clerical and Inadvertent Error) का खामियाजा छात्र को नहीं भुगतना चाहिए। इसी के साथ कोर्ट ने मानव भारती यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया है कि वह कानून की छात्रा की मार्कशीट और डिग्री जारी करे।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें छात्र को तथ्यात्मक विवाद के निपटारे के लिए सक्षम अदालत जाने को कहा गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि चूंकि यूनिवर्सिटी ने रिकॉर्ड में अपनी गलती स्वीकार कर ली है, इसलिए अब कोई विवाद शेष नहीं रह जाता है।
क्या है पूरा मामला
यह अपील मानव भारती यूनिवर्सिटी (MBU) के बीए एलएलबी (BA.LLB) बैच 2017-2022 की छात्रा प्रतिमा दास द्वारा दायर की गई थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अपने 5वें से 10वें सेमेस्टर की मार्कशीट और लॉ डिग्री जारी करवाने की गुहार लगाई थी।
यह मामला यूनिवर्सिटी के खिलाफ फर्जी डिग्री बेचने के आरोपों और उससे जुड़ी जांच की पृष्ठभूमि में उभरा था। वर्ष 2019 में एक विशेष जांच दल (SIT) ने यूनिवर्सिटी के रिकॉर्ड जब्त कर लिए थे, जिसके कारण छात्रों को अपने शैक्षणिक दस्तावेज प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था।
छात्रों की समस्याओं को देखते हुए, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पहले यूनिवर्सिटी को दस्तावेजों के सत्यापन के लिए एक समिति गठित करने का निर्देश दिया था। सत्यापन के लिए मानदंड यह था कि “ग्रीन रजिस्टर” (प्राथमिक आंतरिक रिकॉर्ड) का मिलान “एडमिशन डिस्क्लोजर लिस्ट” से किया जाए।
रिकॉर्ड में विसंगति और लिपिकीय त्रुटि
जब याचिकाकर्ता ने अपने दस्तावेज मांगे, तो उन्हें बताया गया कि उनका नाम ‘ग्रीन रजिस्टर’ में तो दर्ज है (एडमिशन नंबर R17BALLB0033 के तहत), लेकिन सत्र 2017-2018 की ‘एडमिशन डिस्क्लोजर लिस्ट’ से उनका नाम गायब है। उनके स्थान पर किसी “मिस्टर अयान नरवाल” का नाम दर्ज था। इस विसंगति के कारण उनके दस्तावेज रोक दिए गए थे।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन 20 दिसंबर 2024 को हाईकोर्ट ने यह कहते हुए मामला निपटा दिया कि वह विवादित तथ्यों का निर्धारण नहीं कर सकता और छात्र को सक्षम अदालत में जाना चाहिए। इसके बाद छात्र ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
यूनिवर्सिटी ने मानी अपनी गलती
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सुनवाई के दौरान मामले में एक नया मोड़ तब आया जब मानव भारती यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार ने 3 दिसंबर 2025 को एक अतिरिक्त हलफनामा (Additional Affidavit) दायर किया।
हलफनामे में यूनिवर्सिटी ने स्वीकार किया कि याचिकाकर्ता एक वास्तविक (bonafide) छात्रा है। रजिस्ट्रार ने स्पष्ट किया:
“यूनिवर्सिटी के पिछले प्रशासन द्वारा की गई एक लिपिकीय और अनजाने में हुई मानवीय भूल (Clerical and Inadvertent Human Error) के कारण याचिकाकर्ता का नाम एचपी-पीईआरसी (HP-PERC) को भेजी गई डिस्क्लोजर लिस्ट में शामिल नहीं किया गया था, और गलती से मिस्टर अयान नरवाल का नाम भेज दिया गया था।”
यूनिवर्सिटी ने यह भी स्पष्ट किया कि अयान नरवाल 2016-2021 बैच का छात्र था और याचिकाकर्ता की जगह उसका नाम आना केवल एक “लिपिकीय बेमेल” (Clerical Mismatch) था, न कि याचिकाकर्ता के प्रवेश को हटाया जाना।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
यूनिवर्सिटी के हलफनामे को रिकॉर्ड पर लेते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अब तथ्यों को लेकर कोई विवाद नहीं है। पीठ ने कहा:
“रिकॉर्ड पर मौजूद हलफनामे और दस्तावेजों से यह निर्विवाद है कि अपीलकर्ता एमबी यूनिवर्सिटी की वास्तविक छात्रा रही हैं और उन्होंने अपनी सभी परीक्षाएं पास की हैं। यह भी स्पष्ट है कि एडमिशन डिस्क्लोजर लिस्ट से अपीलकर्ता का नाम बाहर होना उनकी गलती नहीं थी, बल्कि यह यूनिवर्सिटी की गलती है, जिसके लिए अपीलकर्ता को पीड़ित नहीं किया जा सकता।”
कोर्ट ने कहा कि चूंकि यूनिवर्सिटी ने गलती मान ली है, इसलिए छात्र को किसी अन्य अदालत में भेजने की आवश्यकता नहीं है।
अपील को स्वीकार करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने मानव भारती यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया है कि वह आज से चार सप्ताह के भीतर अपीलकर्ता को 5वें से 10वें सेमेस्टर की मार्कशीट, डिग्री और अन्य संबंधित दस्तावेज जारी करे।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: प्रतिमा दास बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अन्य
- केस नंबर: सिविल अपील (एसएलपी (सिविल) नंबर 15180 ऑफ 2025 से उद्भूत)
- कोरम: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह

