धारा 37 के तहत अपीलीय अदालत का अधिकार क्षेत्र सीमित; धारा 34 अदालत के ‘स्वीकार्य दृष्टिकोण’ को बदलकर हर्जाने की नई गणना करना अनुचित: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 37 के तहत अपीलीय अदालत का अधिकार क्षेत्र सीमित है। शीर्ष अदालत ने कहा कि धारा 37 के तहत अदालत केवल यह जांच सकती है कि क्या धारा 34 के तहत अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र का सही उपयोग किया है या नहीं। अपीलीय अदालत धारा 34 अदालत द्वारा अपनाए गए “स्वीकार्य दृष्टिकोण” (Plausible View) की जगह अपना दृष्टिकोण नहीं थोप सकती और न ही परिनिर्धारित हर्जाने (Liquidated Damages) की नए सिरे से गणना कर सकती है।

न्यायमूर्ति पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें सौर ऊर्जा संयंत्र को चालू करने में देरी के विवाद में एकल न्यायाधीश द्वारा दिए गए मुआवजे की राशि को संशोधित कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने एकल न्यायाधीश के आदेश को बहाल करते हुए कहा कि मुआवजे की राशि का पुन: निर्धारण करना धारा 37 के दायरे से बाहर है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय सौर मिशन (JNNSM) से जुड़ा है, जिसे 2010 में शुरू किया गया था। इस मिशन के तहत एनटीपीसी विद्युत व्यापार निगम लिमिटेड (NVVNL) को नोडल एजेंसी बनाया गया था। NVVNL ने 24 जनवरी 2012 को मेसर्स साईसुधीर एनर्जी लिमिटेड (SEL) के साथ विद्युत खरीद समझौता (PPA) किया। इस समझौते के तहत SEL को 20 मेगावाट सौर ऊर्जा की आपूर्ति करनी थी और परियोजना को चालू करने की निर्धारित तिथि 26 फरवरी 2013 थी।

SEL निर्धारित समय सीमा को पूरा करने में विफल रही। उसने 10 मेगावाट क्षमता 26 अप्रैल 2013 को (दो महीने की देरी से) और शेष 10 मेगावाट क्षमता 24 जुलाई 2013 को (पाँच महीने की देरी से) चालू की। PPA के क्लॉज 4.6 में इस तरह की देरी के लिए परिनिर्धारित हर्जाने का प्रावधान था।

मामला मध्यस्थता में गया, जहां तीन सदस्यीय न्यायाधिकरण ने 21 जुलाई 2015 को बहुमत से फैसला सुनाया और SEL को केवल 1.2 करोड़ रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया। हालांकि, अल्पमत वाले सदस्य ने असहमति जताते हुए कहा कि NVVNL लगभग 49.92 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी को भुनाने का हकदार है क्योंकि यह नुकसान का वास्तविक पूर्व-अनुमान था।

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धारा 34 के तहत इस फैसले को चुनौती दी गई। दिल्ली हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने 8 सितंबर 2016 को बहुमत के फैसले को रद्द कर दिया। एकल न्यायाधीश ने माना कि हालांकि NVVNL ने वास्तविक नुकसान साबित नहीं किया है, लेकिन देरी अनुबंध का उल्लंघन है। न्याय के संतुलन को देखते हुए, एकल न्यायाधीश ने फैसले को संशोधित किया और क्लॉज 4.6 के तहत दावा की जा सकने वाली राशि का 50% (लगभग 27.06 करोड़ रुपये) देने का आदेश दिया।

इसके बाद दोनों पक्षों ने धारा 37 के तहत अपील दायर की। 18 जनवरी 2018 को दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश को संशोधित कर दिया और एक अलग गणना पद्धति (1,00,000 रुपये प्रति मेगावाट प्रतिदिन) लागू करते हुए मुआवजे को घटाकर 20.70 करोड़ रुपये कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दलीलें

SEL का पक्ष: SEL ने तर्क दिया कि भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 74 के तहत वास्तविक नुकसान साबित करना अनिवार्य है। उन्होंने कैलाश नाथ एसोसिएट्स बनाम डीडीए मामले का हवाला देते हुए कहा कि चूंकि NVVNL ने कोई निवेश नहीं किया था, इसलिए उसे कोई नुकसान नहीं हुआ। उनका यह भी कहना था कि धारा 34 और 37 के तहत अदालतें मध्यस्थता फैसले को संशोधित नहीं कर सकतीं।

NVVNL का पक्ष: NVVNL ने तर्क दिया कि यह परियोजना जनहित से जुड़ी एक सार्वजनिक उपयोगिता परियोजना (Public Utility Project) है। मेसर्स कंस्ट्रक्शन एंड डिजाइन सर्विसेज बनाम डीडीए का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसी परियोजनाओं में देरी का मतलब ही नुकसान (जैसे पर्यावरणीय क्षति) है और इसमें वास्तविक नुकसान साबित करने की आवश्यकता नहीं होती। NVVNL ने दावा किया कि वह PPA के तहत 54.12 करोड़ रुपये के पूर्ण हर्जाने का हकदार है।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणी

जनहित और परिनिर्धारित हर्जाना: सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि PPA केवल एक वाणिज्यिक समझौता था। कोर्ट ने कहा कि इसका उद्देश्य राष्ट्रीय सौर मिशन के तहत हरित ऊर्जा को बढ़ावा देना था, जो निश्चित रूप से जनहित में है। कोर्ट ने मेसर्स कंस्ट्रक्शन एंड डिजाइन सर्विसेज मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि सार्वजनिक उपयोगिता परियोजनाओं में यह साबित करने का भार उल्लंघन करने वाले पक्ष पर होता है कि कोई नुकसान नहीं हुआ है, और SEL इसे साबित करने में विफल रही।

धारा 34 का दायरा: संशोधन की शक्ति सुप्रीम: कोर्ट ने एकल न्यायाधीश द्वारा फैसले को संशोधित करने की शक्ति को बरकरार रखा। गायत्री बालासामी बनाम आईएसजी नोवासॉफ्ट टेक्नोलॉजीज लिमिटेड मामले के संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

“धारा 34 अदालत द्वारा उचित मुआवजे की राशि को बढ़ाने के लिए फैसले में संशोधन करना एक स्वीकार्य प्रक्रिया थी… यह संशोधन केवल मामले के तथ्यों पर PPA के क्लॉज 4.6.2 को लागू करने के उद्देश्य से था।”

धारा 37 के अधिकार क्षेत्र की सीमाएं: सुप्रीम कोर्ट ने खंडपीठ द्वारा किए गए हस्तक्षेप पर कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि जब एकल न्यायाधीश का निर्णय न तो मनमाना था और न ही विकृत, तो खंडपीठ ने मुआवजे की फिर से गणना करके अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है।

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कोर्ट ने कहा:

“खंडपीठ द्वारा उचित मुआवजे की राशि में संशोधन करना केवल एकल न्यायाधीश द्वारा अपनाए गए स्वीकार्य दृष्टिकोण (Plausible View) के स्थान पर अपना दृष्टिकोण प्रतिस्थापित करना है। धारा 34 के तहत लिए गए निर्णय पर इस तरह से अलग दृष्टिकोण अपनाना धारा 37 के दायरे से बाहर है।”

अदालत ने एसी चोकसी शेयर ब्रोकर प्राइवेट लिमिटेड बनाम जतिन प्रताप देसाई का हवाला देते हुए दोहराया कि धारा 37 के तहत अदालत को केवल यह निर्धारित करना चाहिए कि क्या धारा 34 अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र का सही और उचित उपयोग किया है।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने NVVNL की अपील स्वीकार कर ली और SEL की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ के 18 जनवरी 2018 के फैसले को उस सीमा तक रद्द कर दिया जहां उसने मुआवजे को संशोधित किया था, और एकल न्यायाधीश के उस आदेश को बहाल कर दिया जिसमें 50% परिनिर्धारित हर्जाना देने का निर्देश दिया गया था।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: मेसर्स साईसुधीर एनर्जी लिमिटेड बनाम मेसर्स एनटीपीसी विद्युत व्यापार निगम लिमिटेड (तथा अन्य)
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 12892-12893 ऑफ 2024 एवं 12894-12895 ऑफ 2024
  • कोरम: न्यायमूर्ति पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर

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