सुप्रीम कोर्ट ने एक उम्रकैद के सजायाफ्ता कैदी द्वारा अपराध के लगभग 46 साल बाद किए गए ‘नाबालिग’ होने के दावे पर तथ्यात्मक जांच का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने अनुच्छेद 32 के तहत दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि किशोरावस्था (juvenility) के दावे को किसी भी स्तर पर स्वीकार किया जा सकता है, यहाँ तक कि मामले के अंतिम निपटारे के बाद भी।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता सुंदर उर्फ सुरेंद्र और तीन अन्य सह-अभियुक्तों पर साल 1983 के एक मामले में सत्र न्यायालय (मेरठ) द्वारा मुकदमा चलाया गया था। 31 जनवरी, 1989 को ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302/34 और 307/34 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
इस सजा को बाद में 30 सितंबर, 2022 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरकरार रखा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) भी 6 अक्टूबर, 2023 को खारिज कर दी गई थी। अब याचिकाकर्ता ने पहली बार किशोरावस्था का मुद्दा उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता ने 12 फरवरी, 1983 के स्कूल रजिस्टर और 19 अप्रैल, 2024 को ग्राम पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र के आधार पर दावा किया कि उसकी जन्म तिथि 1 फरवरी, 1968 है। याचिकाकर्ता के अनुसार, चूंकि अपराध 7 फरवरी, 1983 को हुआ था, इसलिए वह उस समय लगभग 15 वर्ष का था और किशोर न्याय अधिनियम (JJ Act) के लाभ का हकदार है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि यह याचिका बहुत देर से दायर की गई है। राज्य सरकार ने तर्क दिया:
“याचिकाकर्ता के किशोरावस्था के दावे की पूरी बुनियाद इन दस्तावेजी रिकॉर्डों की जांच और सत्यापन पर टिकी है, जिसके लिए एक तथ्यात्मक जांच और साक्ष्य परीक्षण की आवश्यकता है… अनुच्छेद 32 के तहत इस माननीय न्यायालय के असाधारण क्षेत्राधिकार में ऐसा अभ्यास कानून की दृष्टि में उचित नहीं हो सकता है।”
न्यायालय का विश्लेषण और मिसालें
सुप्रीम कोर्ट ने राहुल कुमार यादव बनाम बिहार राज्य (2024) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें जेजे एक्ट की धारा 9(2) के प्रावधानों पर चर्चा की गई थी। पीठ ने टिप्पणी की:
“जेजे एक्ट, 2015 की धारा 9(2) का प्रावधान स्पष्ट रूप से कहता है कि किशोरावस्था का दावा किसी भी न्यायालय के समक्ष उठाया जा सकता है और इसे किसी भी चरण में मान्यता दी जाएगी, यहाँ तक कि मामले के अंतिम निपटारे के बाद भी।”
इसके अलावा, कोर्ट ने विनोद कटारा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023) मामले का भी जिक्र किया, जिसमें यह कहा गया था कि जब भी ऐसा दावा किया जाए, तो केवल हलफनामे के बजाय साक्ष्य लेकर जांच की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता द्वारा पेश किए गए दस्तावेज प्रथम दृष्टया यह संकेत देते हैं कि वह अपराध के समय ‘कानून के साथ संघर्षरत बालक’ (child in conflict with law) की श्रेणी में आ सकता है।
न्यायालय ने मेरठ के सत्र न्यायाधीश को याचिकाकर्ता की जन्म तिथि की जांच करने का आदेश देते हुए कहा:
- सत्र न्यायाधीश स्वयं या किसी अन्य अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के माध्यम से किशोर न्याय अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जांच कराएं।
- याचिकाकर्ता, राज्य और शिकायतकर्ता/पीड़ित पक्ष को साक्ष्य प्रस्तुत करने का उचित अवसर दिया जाए।
- यदि आवश्यक हो, तो जांच में शामिल करने के लिए याचिकाकर्ता को जेल से बुलाया जा सकता है।
- जांच रिपोर्ट तीन महीने के भीतर सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को सौंपी जाए।
इस मामले की अगली सुनवाई 26 मई, 2026 को होगी।
- केस का शीर्षक: सुंदर @ सुरेंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
- केस संख्या: रिट पिटीशन (क्रिमिनल) संख्या 514/2025

