नए श्रम कानून भविष्य की ज़रूरत हैं, इन्हें न्याय और समानता की भावना से लागू किया जाना चाहिए: न्यायमूर्ति मनमोहन

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनमोहन ने गुरुवार को केंद्र सरकार द्वारा लाए गए चार नए श्रम कानूनों का स्वागत करते हुए कहा कि इन सुधारों का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब इन्हें निष्पक्षता, समानता और स्पष्ट नीति के साथ ज़मीनी स्तर पर लागू किया जाए। उन्होंने कहा कि ये कानून अतीत के लिए नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के श्रम ढांचे को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं।

न्यायमूर्ति मनमोहन ‘डिकोडिंग द कोड्स – कॉन्फ्रेंस ऑन फोर लेबर कोड्स’ नामक एक राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। यह एक दिवसीय सम्मेलन सोसाइटी ऑफ इंडियन लॉ फर्म्स (SILF) और कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (CII) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था। अपने संबोधन में उन्होंने श्रम सुधारों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए स्पष्टता, निरंतरता और संस्थागत तैयारी की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि भारत के पुराने श्रम कानून अपने समय में उपयोगी थे, लेकिन अब वे वर्तमान कार्य परिवेश के अनुरूप नहीं रह गए हैं। “श्रम की गरिमा केवल नारा नहीं, बल्कि हमारे कानूनों का हिस्सा होनी चाहिए। सौ साल पुराने कानून अपना समय पूरा कर चुके हैं। वे इतिहास का हिस्सा हैं, जबकि नए श्रम कोड भविष्य से जुड़े हैं,” न्यायमूर्ति मनमोहन ने कहा।

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चार नए श्रम कोड—वेतन संहिता, 2019; औद्योगिक संबंध संहिता, 2020; सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020; और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशाएं संहिता, 2020—को 21 नवंबर को अधिसूचित किया गया था। इन संहिताओं के माध्यम से 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को समेकित और सरल बनाया गया है।

न्यायमूर्ति मनमोहन ने कहा कि कई पुराने श्रम कानून, जिनमें 1926 और 1936 के अधिनियम भी शामिल हैं, आज की आर्थिक और तकनीकी वास्तविकताओं से मेल नहीं खाते। उन्होंने विशेष रूप से डिजिटल प्लेटफॉर्म, गिग वर्क और रोजगार के नए स्वरूपों का उल्लेख करते हुए कहा कि पुराने कानून इन क्षेत्रों को समुचित रूप से कवर नहीं कर पाते थे।

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उन्होंने बताया कि भारत में लगभग 50 करोड़ का श्रमबल है, जिसमें से करीब 90 प्रतिशत लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। ऐसे में श्रम कानूनों का आधुनिकीकरण और तर्कसंगत बनाना अनिवार्य था, ताकि लंबे समय से चली आ रही सुरक्षा और कवरेज की खामियों को दूर किया जा सके।

न्यायमूर्ति मनमोहन के अनुसार, नए श्रम सुधारों से अनुपालन प्रक्रिया सरल होगी और उद्योगों को अधिक संचालनगत लचीलापन मिलेगा। उन्होंने कहा कि छंटनी और ले-ऑफ जैसे मामलों में पूर्व सरकारी अनुमति की सीमा बढ़ाना भी इसी दिशा में उठाया गया कदम है।

उन्होंने यह भी कहा कि इन चार श्रम कोड्स का उद्देश्य ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ और श्रमिक कल्याण के बीच संतुलन स्थापित करना है। साथ ही, ये सुधार न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा का दायरा असंगठित क्षेत्र, गिग वर्कर्स, प्लेटफॉर्म वर्कर्स और फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों तक बढ़ाते हैं।

हालांकि, न्यायमूर्ति मनमोहन ने स्पष्ट किया कि इन सुधारों की असली परीक्षा राज्यों द्वारा इनके प्रभावी और समन्वित क्रियान्वयन में होगी। “कानून बना देना पर्याप्त नहीं है, असली चुनौती उन्हें सही ढंग से लागू करने की है,” उन्होंने कहा।

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नए श्रम कानूनों के तहत महिलाओं के लिए अतिरिक्त सुरक्षा और अधिकार भी सुनिश्चित किए गए हैं। इनमें नाइट शिफ्ट में काम करने की अनुमति, 40 वर्ष से अधिक आयु के श्रमिकों के लिए मुफ्त वार्षिक स्वास्थ्य जांच, खतरनाक इकाइयों सहित पूरे देश में ईएसआईसी कवरेज, और पंजीकरण, लाइसेंस व रिटर्न के लिए एकल प्रणाली जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

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