सुप्रीम कोर्ट ने एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) द्वारा एकतरफा रूप से नियुक्त किए गए एकमात्र मध्यस्थ (Sole Arbitrator) द्वारा पारित पंचाट (Award) को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने माना कि ऐसी नियुक्ति ‘प्रारंभ से ही शून्य’ (Void ab initio) है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि मध्यस्थता कार्यवाही में केवल भाग लेना, दलीलें दाखिल करना या चुप्पी साधे रहना मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 12(5) के तहत मध्यस्थ की अयोग्यता से ‘त्याग’ (Waiver) नहीं माना जा सकता। पीठ ने जोर देकर कहा कि इस अयोग्यता को माफ करने के लिए विवाद उत्पन्न होने के बाद पक्षकारों के बीच “लिखित में स्पष्ट समझौता” (Express agreement in writing) होना अनिवार्य है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने भद्र इंटरनेशनल (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें मध्यस्थ की नियुक्ति और उसके बाद के फैसले को बरकरार रखा गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद 29 नवंबर, 2010 को अपीलकर्ता (भद्र इंटरनेशनल के नेतृत्व वाला कंसोर्टियम) और प्रतिवादी (एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया) के बीच ग्राउंड हैंडलिंग सेवाओं के लिए निष्पादित एक लाइसेंस समझौते से उत्पन्न हुआ था। समझौते के क्लॉज 78 में प्रावधान था कि किसी भी विवाद को “प्राधिकरण के चेयरमैन द्वारा नियुक्त एक व्यक्ति की एकमात्र मध्यस्थता” के लिए भेजा जाएगा।
विवाद उत्पन्न होने पर, अपीलकर्ताओं ने 27 नवंबर, 2015 को मध्यस्थता क्लॉज का आह्वान किया। इसके परिणामस्वरूप, AAI के चेयरमैन ने एक एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया। 22 मार्च, 2016 को, मध्यस्थ ने पहला प्रक्रियात्मक आदेश (Procedural Order) पारित किया जिसमें दर्ज किया गया कि “किसी भी पक्ष को एकमात्र मध्यस्थ के रूप में मेरी नियुक्ति पर कोई आपत्ति नहीं है।” कार्यवाही दो साल से अधिक समय तक चली और पक्षकारों ने अधिनियम की धारा 29A के तहत समय विस्तार भी मांगा।
30 जुलाई, 2018 को, मध्यस्थ ने अपीलकर्ताओं के दावों को खारिज करते हुए ‘शून्य’ (Nil) अवार्ड पारित किया। अपीलकर्ताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष धारा 34 के तहत अवार्ड को चुनौती दी। बाद में, उन्होंने अपने आवेदन में संशोधन की मांग की ताकि यह विशिष्ट आपत्ति उठाई जा सके कि 2015 के संशोधन द्वारा अधिनियम में धारा 12(5) को शामिल किए जाने के मद्देनजर मध्यस्थ की एकतरफा नियुक्ति अवैध थी।
एकल न्यायाधीश ने धारा 34 के आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अपीलकर्ताओं ने कार्यवाही के दौरान आपत्ति न करके धारा 12(5) की प्रयोज्यता को माफ (waive) कर दिया था। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने भी इस दृष्टिकोण की पुष्टि की।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नवीन पाहवा ने तर्क दिया कि एकमात्र मध्यस्थ कार्य करने के लिए अयोग्य थे क्योंकि उन्हें प्रतिवादी के चेयरमैन द्वारा एकतरफा नियुक्त किया गया था, जो स्वयं अधिनियम की सातवीं अनुसूची के तहत मध्यस्थ के रूप में कार्य करने के लिए अयोग्य थे। टीआरएफ लिमिटेड बनाम एर्गो इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स लिमिटेड और पर्किन्स ईस्टमैन आर्किटेक्ट्स डीपीसी बनाम एचएससीसी (इंडिया) लिमिटेड में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भरोसा करते हुए, उन्होंने तर्क दिया कि एक अयोग्य व्यक्ति द्वारा की गई नियुक्ति कानून में शून्य (Void) है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि कार्यवाही में भाग लेना धारा 12(5) के प्रावधान के तहत ‘त्याग’ (Waiver) नहीं है, जिसके लिए “लिखित में स्पष्ट समझौता” आवश्यक है।
प्रतिवादी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पराग त्रिपाठी ने तर्क दिया कि पहले प्रक्रियात्मक आदेश में दर्ज पक्षकारों की सहमति “लिखित में स्पष्ट समझौता” का गठन करती है। उन्होंने तर्क दिया कि स्टेटमेंट ऑफ क्लेम दाखिल करके और धारा 29A के तहत विस्तार मांगकर, अपीलकर्ताओं ने मध्यस्थ के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) को स्वीकार कर लिया था। प्रतिवादी ने जोर दिया कि अवार्ड पारित होने के बाद यह आपत्ति एक ‘विचारोपरान्त’ (Afterthought) के रूप में उठाई गई थी।
न्यायालय का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने तीन प्रमुख मुद्दों की जांच की: मध्यस्थ की अयोग्यता, ‘त्याग’ (Waiver) का प्रश्न, और क्या धारा 34 के तहत पहली बार आपत्ति उठाई जा सकती है।
1. एकतरफा नियुक्ति और अयोग्यता
कोर्ट ने टीआरएफ लिमिटेड और पर्किन्स ईस्टमैन में स्थापित सिद्धांत को दोहराया कि जो व्यक्ति धारा 12(5) और सातवीं अनुसूची के तहत मध्यस्थ के रूप में कार्य करने के लिए अयोग्य है, वह किसी अन्य व्यक्ति को मध्यस्थ के रूप में नामित नहीं कर सकता। पीठ ने पाया कि AAI के चेयरमैन सातवीं अनुसूची की मद 1, 5 और 12 के तहत अयोग्य थे।
जस्टिस पारदीवाला ने कहा:
“एक बार जब चेयरमैन कानून के संचालन द्वारा अयोग्य हो जाते हैं, तो वह किसी अन्य व्यक्ति को मध्यस्थ के रूप में नामित या नियुक्त नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए, जो व्यक्ति स्वयं कुर्सी पर नहीं बैठ सकता, वह किसी अन्य को उस पर बैठने के लिए अधिकृत नहीं कर सकता।”
कोर्ट ने माना कि नियुक्ति प्रारंभ से ही शून्य (Void ab initio) थी और मध्यस्थ विधिक रूप से (De jure) अयोग्य थे।
2. छूट के लिए ‘लिखित में स्पष्ट समझौता’ आवश्यक
कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया कि कार्यवाही में भाग लेना या प्रक्रियात्मक आदेश में “कोई आपत्ति नहीं” दर्ज करना धारा 12(5) के प्रावधान के तहत एक वैध छूट (Waiver) है।
कोर्ट ने कहा:
“‘लिखित में स्पष्ट समझौता’ अभिव्यक्ति एक जानबूझकर और सूचित कृत्य को प्रदर्शित करती है कि हालांकि एक पक्ष मध्यस्थ की अयोग्यता के बारे में पूरी तरह से अवगत है, फिर भी वह ऐसे मध्यस्थ की नियुक्ति के खिलाफ आपत्ति करने के अधिकार को छोड़ने का विकल्प चुनता है।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि आचरण या निहितार्थ (Implication) से छूट का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। विशेष रूप से, कोर्ट ने माना कि निम्नलिखित “लिखित में स्पष्ट समझौता” नहीं हैं:
- मध्यस्थता का आह्वान करने वाला नोटिस।
- कोई आपत्ति नहीं दर्ज करने वाला प्रक्रियात्मक आदेश।
- दावे का बयान (Statement of Claim) जमा करना।
- धारा 29A के तहत समय विस्तार के लिए आवेदन दाखिल करना।
- कार्यवाही में निरंतर भागीदारी।
3. आपत्ति किसी भी स्तर पर उठाई जा सकती है
कोर्ट ने कहा कि चूंकि वैधानिक अयोग्यता के कारण नियुक्ति प्रारंभ से ही शून्य थी, इसलिए यह दोष अधिकार क्षेत्र की जड़ तक जाता है। इसलिए, अवार्ड को रद्द करने के लिए धारा 34 के तहत कार्यवाही सहित किसी भी स्तर पर आपत्ति उठाई जा सकती है।
निर्णय में नोट किया गया:
“अधिनियम, 1996 पक्षकारों की सहमति के बिना मध्यस्थ न्यायाधिकरण को अधिकार क्षेत्र प्रदान करने को मान्यता नहीं देता है… जब एक मध्यस्थ न्यायाधिकरण का गठन एकतरफा रूप से किया जाता है, तो ऐसी सहमति अनुपस्थित होती है, जिससे न्यायाधिकरण विषय-वस्तु के अधिकार क्षेत्र से वंचित हो जाता है।”
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार किया और दिल्ली हाईकोर्ट के आक्षेपित निर्णय को रद्द कर दिया। नतीजतन, 30 जुलाई, 2018 के मध्यस्थता अवार्ड को भी रद्द कर दिया गया।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:
“हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि हाईकोर्ट ने आक्षेपित निर्णय पारित करने में भारी त्रुटि की है… पक्षकारों के लिए कानून के अनुसार नए सिरे से मध्यस्थता कार्यवाही शुरू करने का विकल्प खुला होगा।”
केस डिटेल्स
केस टाइटल: भद्र इंटरनेशनल (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड व अन्य बनाम एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया
केस संख्या: सिविल अपील संख्या 37-38 ऑफ 2026 (एस.एल.पी. (सी) संख्या 16107-16108 ऑफ 2025 से उद्भूत)
बेंच: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन

