सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में शिकायतकर्ता की ननद और सास-ससुर के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी ठोस सबूत के लगाए गए “अस्पष्ट और सामान्य” (Vague and Omnibus) आरोपों के आधार पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के दिसंबर 2023 के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया था।
अदालत ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि इस मामले में कानूनी कार्यवाही शुरू करने में 6 साल और 7 महीने की देरी हुई, जिसे बिना किसी उचित स्पष्टीकरण के अभियोजन पक्ष के लिए एक “बड़ी कमजोरी” (Fatal) करार दिया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
इस मामले के अपीलकर्ता—ननद (जो एक कॉलेज प्रोफेसर हैं) और सास-ससुर (उम्र 73 और 71 वर्ष)—ने लखीमपुर खीरी के मोहम्मदी पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR संख्या 758/2023 को चुनौती दी थी। शिकायतकर्ता, जिसकी शादी अप्रैल 2017 में हुई थी, ने आरोप लगाया था कि शादी के बाद से ही उसके ससुराल वाले 8,50,000 रुपये और कार की मांग कर रहे थे।
शिकायतकर्ता ने जुलाई 2017 की एक घटना का भी जिक्र किया था, जिसमें उसने आरोप लगाया कि पति और ससुराल वालों ने उसके साथ मारपीट की जिससे उसका गर्भपात हो गया। इसके अलावा, दिवाली 2017 के दौरान ससुर पर “अनुचित व्यवहार” का आरोप लगाया गया था। हालांकि, यह FIR 15 नवंबर 2023 को तब दर्ज कराई गई जब कथित तौर पर शिकायतकर्ता को मारपीट कर घर से निकाल दिया गया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि ननद गाजियाबाद में अलग रहती हैं और शादी के बाद कभी भी कानपुर में नहीं रहीं। गर्भपात के आरोपों को “फर्जी और मनगढ़ंत” बताते हुए कहा गया कि इसका कोई मेडिकल रिकॉर्ड नहीं है। सास-ससुर के वकील ने तर्क दिया कि वे वरिष्ठ नागरिक हैं और कानपुर में अलग रहते हैं, इसलिए उनके बीच ऐसा कोई घरेलू संबंध नहीं था जिससे प्रताड़ना की संभावना बने।
उत्तर प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन किया और कहा कि FIR में संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) के संकेत मिलते हैं, इसलिए इसकी जांच ट्रायल में होनी चाहिए। हालांकि, नोटिस दिए जाने के बावजूद शिकायतकर्ता सुप्रीम कोर्ट में पेश नहीं हुईं।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
कोर्ट ने गौर किया कि पुलिस की फाइनल चार्जशीट से गर्भपात (धारा 313 IPC) की धारा को सबूतों के अभाव में पहले ही हटा दिया गया था। बेंच ने टिप्पणी की:
“केवल यह कहना कि अपीलकर्ताओं ने अक्सर दहेज की मांग की और शिकायतकर्ता को प्रताड़ित किया, उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक कि रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य सामग्री से इन आरोपों की पुष्टि न होती हो।”
FIR दर्ज करने में हुई लगभग सात साल की देरी पर बेंच ने कानूनी सिद्धांत ‘Vigilantibus non dormientibus jura subveniunt’ (कानून उन्हीं की रक्षा करता है जो अपने अधिकारों के प्रति सतर्क हैं) का हवाला देते हुए कहा:
“वैवाहिक मामलों या पति-पत्नी के बीच आपराधिक मामलों में देरी का महत्व और बढ़ जाता है… सात साल की देरी अभियोजन पक्ष के मामले के लिए विनाशकारी हो सकती है, खासकर जब उस देरी का कोई उचित कारण न बताया गया हो।”
अदालत ने वैवाहिक विवादों में पति के पूरे परिवार को घसीटने की प्रवृत्ति पर दारा लक्ष्मी नारायण बनाम तेलंगाना राज्य (2025) मामले का जिक्र करते हुए कहा:
“वैवाहिक कलह से उत्पन्न आपराधिक मामले में परिवार के सदस्यों के नामों का केवल उल्लेख करना, जबकि उनकी सक्रिय संलिप्तता के विशिष्ट आरोप न हों, इसे शुरुआत में ही खत्म कर दिया जाना चाहिए। न्यायिक अनुभव से यह तथ्य सामने आया है कि अक्सर पति के परिवार के सभी सदस्यों को फंसाने की प्रवृत्ति होती है।”
ससुर के खिलाफ छेड़छाड़ (धारा 354 IPC) के आरोप पर बेंच ने कहा कि “सिर्फ इस तरह के बयान देना… अदालत में टिक नहीं सकता” क्योंकि इसके समर्थन में कोई ठोस सामग्री पेश नहीं की गई।
अदालत का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ये आरोप “अत्यधिक असंभव और अविश्वसनीय” हैं। अदालत ने माना कि वरिष्ठ नागरिकों और एक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत ननद के खिलाफ इस केस को जारी रखना न्याय के हित में नहीं होगा और यह कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल (1992) मामले के सिद्धांतों को लागू करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने FIR संख्या 758/2023, उसके बाद की चार्जशीट और मोहम्मदी खीरी की कोर्ट में लंबित आपराधिक मामले को ननद और सास-ससुर के संदर्भ में रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस आदेश का असर पति-पत्नी के बीच चल रहे अन्य वैवाहिक विवादों पर नहीं पड़ेगा।
केस विवरण
- केस टाइटल: चारुल शुक्ला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील (SLP (Crl.) No. 555/2024 से उत्पन्न)
- कोरम: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान
- दिनांक: 25 मार्च, 2026

