सुप्रीम कोर्ट ने इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) के सदस्य (अकाउंटेंट) पद के लिए पूर्व सेना अधिकारी और आईआरएस अधिकारी प्रमोद बजाज की उम्मीदवारी खारिज करने की सिफारिश को रद्द कर दिया है। अदालत ने इसे “टार्गेटेड विभागीय प्रतिशोध” और “लंबी प्रताड़ना” का मामला बताया और केंद्र सरकार पर ₹5 लाख का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने चयन प्रक्रिया में शामिल उस अधिकारी को भी निष्कासित करने का निर्देश दिया जो पहले बजाज के खिलाफ अवमानना कार्यवाही का सामना कर चुका था।
प्रमोद बजाज को 1980 में स्थायी कमीशन अधिकारी के रूप में सेना में नियुक्त किया गया था। सैन्य अभियानों के दौरान वे घायल हुए और सेवा से रिहा कर दिए गए। इसके बाद उन्होंने 1989 में सिविल सेवा परीक्षा पास की और भारतीय राजस्व सेवा (IRS) में शामिल हो गए। आयकर विभाग में बजाज ने कई वरिष्ठ पदों पर कार्य किया और 2012 में कमिश्नर के पद पर पदोन्नत हुए। उनका सेवा रिकॉर्ड निष्कलंक रहा।
2014 में उन्होंने ITAT में सदस्य (अकाउंटेंट) पद के लिए आवेदन किया। उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश टी एस ठाकुर की अध्यक्षता में गठित सर्च-कम-सेलेक्शन कमेटी (SCSC) ने उन्हें ऑल इंडिया रैंक-1 पर चुना था।
इसके बावजूद केंद्र सरकार ने उनके खिलाफ कथित रूप से इंटेलिजेंस ब्यूरो की “विवादास्पद” रिपोर्ट के आधार पर नियुक्ति पत्र जारी नहीं किया। ये रिपोर्टें उनके और उनकी पत्नी के बीच चल रहे विवाद से जुड़ी बताई गईं। इसके बाद बजाज को केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT), उच्च न्यायालय और अंततः सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने केंद्र सरकार के रवैये को कठोर शब्दों में निंदा की और कहा:
“यह मामला विभागीय टार्गेटेड प्रतिशोध, दुर्भावनापूर्ण कार्यवाहियों और लंबी प्रताड़ना की दारुण गाथा को दर्शाता है।”
कोर्ट ने 1 सितंबर 2024 को आयोजित SCSC की बैठक की कार्यवाही रद्द कर दी, जिसमें बजाज की उम्मीदवारी खारिज की गई थी। कोर्ट ने केंद्र सरकार (DoPT) को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर नई SCSC बैठक बुलाए, जिसमें उस अधिकारी को शामिल न किया जाए जिसने पूर्व में बजाज के खिलाफ अवमानना कार्यवाही का सामना किया है।
“‘उस अधिकारी’ की समिति में मौजूदगी, जो पहले ही याचिकाकर्ता के खिलाफ अवमानना कार्यवाही में शामिल था, निष्पक्षता के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है।”
कोर्ट ने कहा कि चयन प्रक्रिया में ऐसे अधिकारी की भागीदारी जो पूर्व में पक्षपातपूर्ण स्थिति में रहा हो, न्याय प्रक्रिया में अविश्वास उत्पन्न करती है।
“प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत यह मांग करता है कि कोई भी व्यक्ति उस मामले का निर्णायक न बने जिसमें उसका व्यक्तिगत हित या पूर्व भूमिका हो।”
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र द्वारा जवाबी हलफनामा दाखिल न करने पर कड़ी टिप्पणी की और कहा कि याचिका में किए गए सभी दावे अप्रतिवादित रह गए। अदालत ने इस आधार पर माना कि SCSC के समक्ष बजाज से संबंधित सभी तथ्य नहीं रखे गए होंगे।
“इस परिस्थिति में ‘उस अधिकारी’ को स्वयं को चयन प्रक्रिया से अलग कर लेना चाहिए था। ऐसा न करके उन्होंने पूर्वाग्रह के संदेह को और पुष्ट किया।”
कोर्ट ने केंद्र सरकार पर ₹5 लाख का जुर्माना लगाते हुए उसकी “अनावश्यक देरी” और “लापरवाही” की आलोचना की।
- DoPT को चार सप्ताह में नई SCSC बैठक आयोजित करनी होगी
- विवादास्पद अधिकारी को बैठक से बाहर रखा जाएगा
- बैठक का परिणाम दो सप्ताह में बजाज को सूचित किया जाएगा
हालांकि अदालत ने उस अधिकारी पर सीधी टिप्पणी करने से परहेज किया जो वर्तमान में संवेदनशील पद पर तैनात है, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया कि चयन प्रक्रिया में उसका शामिल होना “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन” था और इससे प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठे।

