सुप्रीम कोर्ट ने उस व्यक्ति के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमति दे दी है, जिस पर व्हाट्सएप मैसेज के जरिए हिंदू धर्म और बीफ सेवन को लेकर विवादित टिप्पणी करने का आरोप है।
गुरुवार को जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने बुद्ध प्रकाश बुद्ध की याचिका पर मध्य प्रदेश पुलिस और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया। बुद्ध ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी है, जिसमें हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया था।
क्या है पूरा विवाद?
यह कानूनी विवाद सात पन्नों के एक व्हाट्सएप मैसेज से शुरू हुआ था, जिसे बुद्ध प्रकाश द्वारा पोस्ट किया गया बताया गया है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, इस मैसेज में दावा किया गया था कि “एक अच्छा हिंदू होने के लिए बीफ (गोमांस) का सेवन करना अनिवार्य है।” साथ ही, यह भी तर्क दिया गया था कि कुछ विशेष अवसरों पर बैल की बलि देना और मांस का सेवन करना धार्मिक रूप से बाध्यकारी है।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि संदेशों में ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ “अपमानजनक और भ्रामक” टिप्पणियां की गई थीं। इसमें दावा किया गया था कि ऐतिहासिक रूप से इस समुदाय के लोग गोमांस का सेवन करते थे और विभिन्न धार्मिक समारोहों में गायों और बैलों की बलि दी जाती थी।
हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द करने से किया था इनकार
सुप्रीम कोर्ट जाने से पहले बुद्ध ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का रुख किया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा था कि एफआईआर में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया अपराध की श्रेणी में आते हैं।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था, “यह मामला ऐसी सामग्री के प्रकाशन या प्रसार से संबंधित है जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने या वैमनस्य को बढ़ावा देने में सक्षम है। एफआईआर में शामिल आरोपों को यदि उनके अंकित मूल्य पर लिया जाए, तो वे संबंधित अपराधों की पुष्टि करते हैं।”
लगाई गई धाराएं
मध्य प्रदेश पुलिस ने बुद्ध प्रकाश के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है:
- धारा 196(1)(b): धर्म या जाति के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना।
- धारा 299: धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से किया गया जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्य।
- धारा 353(1)(c) और 353(2): सार्वजनिक शरारत (public mischief) को बढ़ावा देने वाले बयान।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस याचिका पर विचार करने के फैसले से अब यह स्पष्ट होगा कि क्या इस तरह के सोशल मीडिया पोस्ट आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आते हैं या वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ऐतिहासिक टिप्पणी के दायरे में सुरक्षित हैं।

