सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के पूर्व मंत्री एनोस एक्का को आय से अधिक संपत्ति (DA) के मामले में बड़ी राहत दी है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने एक्का की सात साल की कठोर कारावास की सजा को निलंबित करते हुए उन्हें जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने झारखंड हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें अपील लंबित रहने के दौरान उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला साल 2008 में दर्ज एक प्राथमिकी (सतर्कता ब्यूरो पी.एस. केस संख्या 26/2008) से जुड़ा है। आरोप था कि एनोस एक्का ने मंत्री पद पर रहते हुए अपनी आय के ज्ञात स्रोतों से कहीं अधिक संपत्ति अर्जित की। साल 2010 में हाईकोर्ट के निर्देश पर इसकी जांच सीबीआई (CBI) को सौंपी गई थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, एक्का ने करीब 57.01 करोड़ रुपये की संपत्ति बनाई, जबकि उनकी जांच-पूर्व संपत्ति केवल 10,48,827 रुपये थी। उन पर आरोप थे कि उन्होंने:
- अवैध धन को वैध बनाने के लिए निर्माण कंपनियां बनाईं।
- छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 (CNT Act) का उल्लंघन कर अपनी पत्नी के नाम पर आदिवासी जमीनों पर कब्जा किया।
- अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर अपनी ही कंपनियों को सरकारी ठेके दिलाए।
29 अगस्त 2025 को ट्रायल कोर्ट ने उन्हें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) और आईपीसी की धारा 120B व 193 के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल की सजा सुनाई थी।
पक्ष-विपक्ष की दलीलें
अपीलकर्ता की दलील: वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने तर्क दिया कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) पहले ही करीब 18 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क कर चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि एक ही तरह के आरोपों के लिए दो अलग-अलग चार्जशीट दाखिल की गई हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत ‘दोहरे दंड’ (Double Jeopardy) के खिलाफ अधिकार का उल्लंघन है। एक्का इस मामले में 10 महीने और पिछले संबंधित मामले में 4 साल की जेल काट चुके हैं।
सीबीआई की दलील: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल देविंदर पाल सिंह ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि एक मंत्री के रूप में एक्का ने अपने पद का दुरुपयोग कर भारी संपत्ति जमा की। उन्होंने तर्क दिया कि भ्रष्टाचार के आरोप गंभीर हैं, इसलिए उन्हें राहत नहीं मिलनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि इस मामले में दो अलग-अलग चार्जशीट (R.C. Case No. 04(A)/2010-AHD-R(B) और R.C. Case No. 04(A)/2010-AHD-R(C)) दाखिल की गई हैं, जिनमें कई आरोप एक जैसे या ओवरलैपिंग हैं। अदालत ने कहा:
“दो अलग-अलग अभियोग चलाने की अनुमति थी या नहीं, इस पहलू पर हाईकोर्ट को लंबित अपीलों का फैसला करते समय विचार करना होगा।”
जमानत मंजूर करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:
“तथ्य यह है कि अपीलकर्ता वर्तमान मामले में भी 10 महीने से अधिक की न्यायिक हिरासत काट चुका है। आय से अधिक संपत्ति के दूसरे मामले में इस अदालत द्वारा सजा निलंबित किए जाने के बाद, हम वर्तमान मामले में भी अपीलकर्ता को जमानत देने के इच्छुक हैं।”
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए एनोस एक्का को निम्नलिखित शर्तों पर जमानत दी:
- रिहाई के 7 दिनों के भीतर ट्रायल कोर्ट में यह हलफनामा (Undertaking) देना होगा कि वह आवश्यकता पड़ने पर आदिवासी जमीन को उसकी मूल स्थिति में वापस लाने की प्रक्रिया में सहयोग करेंगे।
- ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्धारित जमानत बांड और शर्तों का पालन करना होगा।
केस विवरण:
- केस शीर्षक: एनोस एक्का बनाम स्टेट थ्रू सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या [निर्धारित होनी है] / 2026 (SLP (Crl.) No(s). 891/2026 से उत्पन्न)
- पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
- दिनांक: 13 अप्रैल, 2026

