सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी जिसमें केंद्र सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को यह निर्देश देने की मांग की गई है कि साइबर अपराध की जांच के दौरान बैंक खातों को फ्रीज़ और डिफ्रीज़ करने के लिए एक समान मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure – SOP) तैयार की जाए।
न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी की पीठ ने केंद्र सरकार को याचिका की प्रति तीन दिनों के भीतर देने का निर्देश दिया और मामले को अगले सप्ताह के लिए सूचीबद्ध किया।
यह याचिका विवेक वर्श्नेय ने अधिवक्ता तुषार मनोहर खैरनार के माध्यम से दायर की है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि तमिलनाडु साइबर सेल ने बिना किसी पूर्व सूचना या न्यायिक आदेश के उनका बैंक खाता फ्रीज़ कर दिया, जिससे उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है — विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यवसाय करने का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत।
याचिका में कहा गया कि खाते को फ्रीज़ किए जाने से उनकी आर्थिक गतिविधियाँ पूरी तरह ठप हो गई हैं और वे आवश्यक खर्च, टैक्स और अन्य दायित्व पूरे करने में असमर्थ हो गए हैं।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की कि केंद्र और आरबीआई को निर्देशित किया जाए कि वे सभी राज्यों के लिए एक समान SOP बनाएं जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि कोई भी बैंक खाता बिना लिखित, कारणयुक्त आदेश और खातेधारक को 24 घंटे के भीतर सूचना दिए बिना फ्रीज़ न किया जाए।
याचिका में यह भी बताया गया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 102(3) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 106(3) के तहत यह अनिवार्य है कि किसी संपत्ति को जब्त या फ्रीज़ करने की सूचना तत्काल संबंधित मजिस्ट्रेट को दी जाए, लेकिन याचिकाकर्ता के मामले में ऐसा नहीं किया गया, जो इसे “असंवैधानिक और अधिकार क्षेत्र से बाहर” बनाता है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से निम्नलिखित राहतें मांगी गई हैं:
- याचिकाकर्ता का खाता तत्काल डिफ्रीज़ किया जाए
- केंद्र सरकार और आरबीआई को पूरे देश के लिए एक समान SOP तैयार करने का निर्देश
- खातों को फ्रीज़ करने की प्रक्रिया में न्यायिक निगरानी और CrPC/BNSS का पालन
- यह सिद्धांत कि जब तक खाताधारक के अपराध में शामिल होने की पुष्टि न हो, तब तक पूरा खाता या उससे अधिक राशि फ्रीज़ न की जाए
विवेक वर्श्नेय ने कहा कि उनका खाता एक आभूषण बिक्री से जुड़े लेनदेन को लेकर फ्रीज़ किया गया और यह बिना किसी अपराध में संलिप्तता सिद्ध हुए किया गया, जो अनुचित है।
याचिका में यह भी कहा गया कि साइबर अपराध से जुड़े मामलों में ऐसे फ्रीज़िंग ऑर्डर आम नागरिकों को अनावश्यक रूप से परेशान करते हैं, और इस कारण से गृह मंत्रालय को एक समान राष्ट्रीय नीति और SOP तैयार करने का निर्देश दिया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई साइबर अपराध जांचों में नागरिकों के वित्तीय अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक अहम क़दम साबित हो सकती है।

