सुप्रीम कोर्ट ने CrPC और BNSS के तहत FIR दर्ज करने और प्राथमिक जांच के बीच अंतर को स्पष्ट किया

क्रिमिनल अपील संख्या 1545 ऑफ 2025 में दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया, और FIR दर्ज करने तथा प्राथमिक जांच (Preliminary Inquiry) के बीच के कानूनी अंतर को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और नवीनतम भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के आलोक में स्पष्ट किया।

न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयाँ द्वारा लिखित इस फैसले में अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक रक्षा पर बल दिया गया, विशेष रूप से उन मामलों में जहां कला और राजनीतिक विचार अभिव्यक्त किए जाते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

जामनगर के एक स्थानीय निवासी की शिकायत पर जामनगर पुलिस स्टेशन में एक FIR दर्ज की गई थी। शिकायत में आरोप था कि इमरान प्रतापगढ़ी ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें एक कविता की पृष्ठभूमि में रचना का पाठ शामिल था। यह वीडियो दिसंबर 2024 में एक सामूहिक विवाह समारोह के दौरान लिया गया था, जिसमें प्रतापगढ़ी एक नगरसेवक के निमंत्रण पर शामिल हुए थे।

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इस FIR में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धाराएं 196, 197(1), 302, 299, 57 और 3(5) लगाई गईं थीं — जिनमें धार्मिक द्वेष फैलाने, धार्मिक भावनाएं आहत करने और अपराधों के लिए उकसावे जैसे गंभीर आरोप लगाए गए।

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गुजरात हाईकोर्ट ने यह कहते हुए FIR रद्द करने से इनकार कर दिया था कि जांच प्रारंभिक अवस्था में है। इस आदेश को चुनौती देते हुए इमरान प्रतापगढ़ी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

मुख्य कानूनी प्रश्न

  1. क्या सोशल मीडिया पोस्ट में पढ़ी गई कविता साम्प्रदायिक घृणा या हिंसा को भड़काने के समान थी?
  2. क्या FIR का पंजीकरण CrPC की धारा 154 और BNSS की धारा 173 के तहत निर्धारित प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन करते हुए हुआ?
  3. क्या हाईकोर्ट ने केवल “प्रारंभिक अवस्था” के आधार पर FIR रद्द न करके गलती की?

न्यायालय की समीक्षा और निष्कर्ष

कविता की सामग्री पर

कोर्ट ने कविता के मूल उर्दू और अंग्रेज़ी अनुवाद को रिकॉर्ड पर लिया और पाया कि उसमें किसी भी धर्म, जाति या समुदाय का कोई उल्लेख नहीं था। अदालत ने टिप्पणी की:

“यह कविता हिंसा को नहीं बढ़ावा देती, बल्कि लोगों को हिंसा से दूर रहने और अन्याय का सामना प्रेम से करने की प्रेरणा देती है।” (¶10)

न्यायमूर्ति ओका ने माना कि कविता प्रतीकात्मक थी और राष्ट्र की एकता या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए कोई खतरा नहीं थी। यह केवल अहिंसात्मक असहमति और विरोध की अभिव्यक्ति थी, जो अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संरक्षित है।

FIR पंजीकरण और प्राथमिक जांच पर

कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 154 और BNSS की धारा 173(3) के बीच महत्वपूर्ण अंतर है। BNSS की धारा 173(3) यह प्रावधान करती है कि जहां अपराध 3 से 7 वर्ष की सजा के बीच हो, वहां FIR दर्ज करने से पहले प्राथमिक जांच की जा सकती है

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“ऐसा लगता है कि BNSS का उद्देश्य ऐसे मामूली मामलों में, जिनमें 7 वर्ष तक की सजा है, सीधे FIR दर्ज करने को रोकना है, भले ही cognizable अपराध दर्शाया गया हो।” (¶25)

बेंच ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के मामलों में, जो अभिव्यक्ति आधारित अपराध हैं और जिनमें सजा 7 वर्ष से कम है, वहां FIR दर्ज करने से पूर्व प्राथमिक जांच आवश्यक है, ताकि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हो सके

हाईकोर्ट की भूमिका पर आलोचना

सुप्रीम कोर्ट ने FIR को रद्द न करने के हाईकोर्ट के निर्णय की कटु आलोचना की:

“हमें हैरानी है कि हाईकोर्ट ने इस महत्वपूर्ण पहलू को नज़रअंदाज़ कर दिया। उसे तो आरंभ में ही इस दुरुपयोग को समाप्त कर देना चाहिए था।” (¶36)

अदालत ने यह भी दोहराया कि “प्रारंभिक अवस्था” कोई ऐसा सार्वभौमिक कारण नहीं हो सकता, जिससे राहत से इनकार किया जाए यदि शिकायत में कोई प्रथमदृष्टया अपराध नहीं बनता हो

‘मेन्स रिया’ और न्यायिक मानक

कोर्ट ने जावेद अहमद हाजम बनाम महाराष्ट्र राज्य और मंजर सईद खान बनाम महाराष्ट्र राज्य जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा कि:

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“BNS की धाराओं 196 और 197 में आरोप सिद्ध करने के लिए मेन्स रिया (दोषपूर्ण मंशा) की आवश्यकता होती है।”

कोर्ट ने 1946 के भगवती चरण शुक्ल मामले में न्यायमूर्ति विवियन बोस के इस प्रसिद्ध कथन को भी उद्धृत किया:

“हमें मजबूत और साहसी व्यक्तियों के मानकों से बात का मूल्यांकन करना चाहिए, न कि उन लोगों के मानकों से जो हर असहमतिपूर्ण विचार में खतरा देख लेते हैं।” (¶32)

फैसले का परिणाम

सुप्रीम कोर्ट ने इमरान प्रतापगढ़ी के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करते हुए कहा:

  • FIR में लगाए गए आरोपों के लिए कोई प्रथमदृष्टया अपराध नहीं बनता
  • FIR यंत्रवत और असंगत रूप से दर्ज की गई थी।
  • कविता संविधान द्वारा संरक्षित अभिव्यक्ति के दायरे में आती है
  • पुलिस ने BNSS की धारा 173(3) के तहत प्राथमिक जांच करने के विवेक का प्रयोग नहीं किया

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