सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को तेलंगाना सरकार से तीखे शब्दों में सवाल किया कि क्या वह राज्य के पूर्व स्पेशल इंटेलिजेंस ब्यूरो (SIB) प्रमुख टी. प्रभाकर राव को तब तक जेल में रखना चाहती है जब तक उनकी मानसिक स्थिति टूट न जाए। अदालत पूर्व आईपीएस अधिकारी द्वारा दायर अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो राज्य में एक हाई-प्रोफाइल फोन टैपिंग मामले में आरोपी हैं।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा:
“हमें यह अहसास हो रहा है कि आप चाहते हैं कि वह जेल में तब तक रहे जब तक वह टूट न जाए। अब हम आपको हमारे आदेश (अंतरिम सुरक्षा) का उपयोग उसके उद्देश्य से परे करने की अनुमति नहीं देंगे।”
पीठ ने राव को दी गई अंतरिम सुरक्षा को स्थायी बनाने की मंशा जताई, लेकिन राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने इसका विरोध किया और कहा कि इससे जुड़े कुछ “महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न” हैं, जिन पर विचार होना चाहिए — जैसे कि क्या एक भगोड़े और विदेश में रह रहे व्यक्ति को अग्रिम जमानत का अधिकार मिल सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर, 2025 को संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अंतरिम आदेश जारी कर प्रभाकर राव को आत्मसमर्पण और पुलिस हिरासत में जांच के लिए निर्देशित किया था। इसके अनुसार उन्होंने 12 दिसंबर को हैदराबाद के जुबली हिल्स थाने में आत्मसमर्पण किया।
बाद में अदालत ने 25 दिसंबर तक पुलिस हिरासत बढ़ा दी थी और आदेश दिया था कि 26 दिसंबर को राव को पूछताछ के बाद रिहा किया जाए। साथ ही, अगली सुनवाई तक उनके खिलाफ कोई दमनात्मक कार्रवाई न की जाए। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम सुरक्षा को 10 मार्च तक बढ़ा दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत का अर्थ यह नहीं है कि राव को पूरी छूट मिल गई है; उन्हें अब भी जांच में सहयोग देना होगा और पुलिस यदि चाहे तो उनसे पूछताछ कर सकती है।
तेलंगाना सरकार ने पहले आरोप लगाया था कि प्रभाकर राव अब भी अपने iCloud खातों की जानकारी साझा नहीं कर रहे हैं, जबकि अदालत ने ऐसा करने का निर्देश दिया था। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि उनके खिलाफ हैदराबाद की एक अदालत ने 22 मई, 2025 को उद्घोषणा आदेश (proclamation order) जारी किया था, जिससे उन्हें अग्रिम जमानत का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
तेलंगाना हाईकोर्ट ने भी उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है।
यह मामला उस कथित निगरानी अभियान से जुड़ा है जो राज्य की पूर्व BRS सरकार के कार्यकाल में चलाया गया था। मार्च 2024 से अब तक हैदराबाद पुलिस ने SIB के चार अधिकारियों को गिरफ्तार किया है, जिनमें एक निलंबित डीएसपी भी शामिल हैं। हालांकि, बाद में उन्हें जमानत मिल गई।
पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने इंटेलिजेंस ब्यूरो की तकनीकी सुविधाओं का दुरुपयोग करते हुए नागरिकों की गैर-कानूनी निगरानी की और उनकी प्रोफाइल तैयार की गईं। ये गतिविधियां “राजनीतिक फायदे” के लिए की गई थीं। साथ ही, आरोप है कि उन्होंने साक्ष्य मिटाने की साजिश भी रची।
सुप्रीम कोर्ट अब न केवल प्रभाकर राव की अग्रिम जमानत याचिका पर विचार कर रही है, बल्कि इस पूरे मामले से जुड़े व्यापक विधिक और संवैधानिक प्रश्नों पर भी मंथन कर रही है, जिनमें राज्य की खुफिया एजेंसियों के दुरुपयोग और नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रभाव जैसे मुद्दे शामिल हैं।

