सुप्रीम कोर्ट ने अपनी पत्नी पर केरोसिन डालकर उसे जिंदा जलाने वाले एक व्यक्ति की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए उसकी आपराधिक अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट के फैसलों की पुष्टि करते हुए, दशकों के कानूनी और सामाजिक सुधारों के बावजूद समाज में पितृसत्ता और घरेलू हिंसा की निरंतरता पर गहरी चिंता व्यक्त की।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने ‘शंकर बनाम राजस्थान राज्य’ (2026 की आपराधिक अपील संख्या…) मामले में यह निर्णय सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता शंकर की शादी मृतका सुगना बाई से उसकी मृत्यु (19 अक्टूबर 2012) से लगभग एक महीने पहले हुई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, अपीलकर्ता के अत्यधिक शराब सेवन और हिंसक व्यवहार के कारण शादी के 20 दिनों के भीतर ही संबंधों में कड़वाहट आ गई थी।
15 अक्टूबर 2012 को, जब मृतका अपने माता-पिता के घर गई थी, तब शंकर ने उसे तुरंत घर लौटकर खाना बनाने के लिए मजबूर किया। जब वह खाना बना रही थी, तब नशे में धुत शंकर ने उसके साथ मारपीट की, उसका गला दबाया और कमरे को अंदर से बंद कर दिया। इसके बाद उसने सुगना बाई पर केरोसिन डालकर माचिस से आग लगा दी। हालांकि पड़ोसियों और शंकर ने बाद में आग बुझाने की कोशिश की, लेकिन सुगना बाई गंभीर रूप से जल चुकी थीं। चार दिन बाद राजस्थान के एमबीएसएच (MBSH) अस्पताल में ‘सेप्टीसीमिया’ के कारण उनकी मृत्यु हो गई।
ट्रायल कोर्ट (सत्र न्यायाधीश, बूंदी) ने 10 दिसंबर 2014 को शंकर को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) और 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना) के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। राजस्थान हाईकोर्ट ने 2019 में उसकी अपील खारिज कर दी थी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री कविता वाडिया ने तर्क दिया कि ‘मृत्युपूर्व कथन’ (Dying Declaration) अविश्वसनीय था। यह तर्क दिया गया कि बयान दर्ज करने वाले मजिस्ट्रेट ने पीड़ित की मानसिक स्थिति को “ठीक नहीं” बताया था। बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि मजिस्ट्रेट ने कोरे कागज पर डॉक्टरों के प्रमाण पत्र लिए थे और मृतका को उसके माता-पिता ने सिखाया-पढ़ाया (tutored) था।
वहीं, राजस्थान राज्य की ओर से अधिवक्ता श्री दिव्यंक पंवार ने निचली अदालतों के निष्कर्षों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि चिकित्सा साक्ष्य और मृतका का बयान एक-दूसरे के पूरक हैं।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 26) के तहत दर्ज मृत्युपूर्व कथन की वैधता पर ध्यान केंद्रित किया।
कोर्ट ने कहा कि मृत्युपूर्व कथन को एक विशेष स्थान प्राप्त है, जो इस दार्शनिक समझ पर आधारित है कि “जब कोई व्यक्ति अपने निर्माता से मिलने वाला होता है… तो उसके मुंह से निकलने वाली बातें केवल सत्य ही होंगी।”
मजिस्ट्रेट (PW-12, अजय कुमार शर्मा) की गवाही की समीक्षा करने के बाद कोर्ट ने पाया कि:
- मजिस्ट्रेट ने स्पष्ट रूप से कहा कि पीड़ित सचेत थी और बयान देने की स्थिति में थी।
- बयान दर्ज करने से पहले ड्यूटी डॉक्टर (PW-15) से फिटनेस प्रमाण पत्र प्राप्त किया गया था।
- यह तथ्य कि प्रमाण पत्र कागज के पिछले हिस्से पर लिया गया था, उसकी पवित्रता (sanctity) को प्रभावित नहीं करता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही कुछ गवाह (PW-2 और PW-3) मुकर गए हों, लेकिन इससे आरोपी को लाभ नहीं मिलता क्योंकि डॉ. नवनीत पाराशर (PW-9) और डॉ. राकेश शर्मा (PW-10) द्वारा दिए गए चिकित्सा साक्ष्य मृतका के बयान की पुष्टि करते हैं।
समाज पर टिप्पणी: एक ‘पोस्टस्क्रिप्ट’
जस्टिस करोल ने अपने फैसले के अंत में एक महत्वपूर्ण ‘पोस्टस्क्रिप्ट’ (Postscript) लिखा, जिसमें उन्होंने भारत में महिलाओं के अधिकारों की वर्तमान स्थिति पर विचार साझा किए। कोर्ट ने उस “विरोधाभास” (paradox) को रेखांकित किया जहां आर्थिक विकास और कानूनी सुधारों के साथ-साथ हिंसा भी जारी है।
कोर्ट ने कई ऐतिहासिक फैसलों और कानूनों का उल्लेख किया:
- कानून: दहेज निषेध अधिनियम (1961), धारा 498A IPC, और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम (2005)।
- न्यायिक मिसालें: शायरा बानो बनाम भारत संघ (तीन तलाक), जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (व्यभिचार), सचिव, रक्षा मंत्रालय बनाम बबीता पुनिया (सेना में स्थायी कमीशन), और विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (संपत्ति में बेटियों के समान अधिकार)।
इन सुधारों के बावजूद, कोर्ट ने एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 2023 में महिलाओं के खिलाफ 4.48 लाख से अधिक अपराध दर्ज किए गए। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“प्रगति और हिंसा का सह-अस्तित्व एक विरोधाभास का संकेत देता है… कानूनी और आर्थिक प्रगति व्यापक स्तर पर दिखाई देती है, लेकिन पितृसत्ता आज भी दैनिक जीवन में व्याप्त है… घरेलू दुर्व्यवहार या पत्नी को जलाने (जैसा कि इस मामले में हुआ) जैसी घटनाएं केवल अपवाद नहीं हैं, बल्कि एक ‘बीमार सामाजिक व्यवस्था’ (disease afflicted social order) का संकेत हैं।”
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालतों के निष्कर्षों में कोई स्पष्ट त्रुटि नहीं थी। अपील को खारिज कर दिया गया और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा गया।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: शंकर बनाम राजस्थान राज्य
- केस नंबर: आपराधिक अपील संख्या… 2026 (@SLP(Crl) No. 13899 of 2025)
- पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह
- दिनांक: 2 अप्रैल, 2026

