सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कांग्रेस नेता जयराम रमेश द्वारा दायर उस रिट याचिका को सुनने से इनकार कर दिया जिसमें उन्होंने पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रोजेक्ट्स को दी गई पूर्वव्यापी (retrospective) मंजूरी को चुनौती दी थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि इस तरह की रिट याचिकाएं दरअसल पहले दिए गए निर्णय की अप्रत्यक्ष समीक्षा की कोशिश होती हैं।
“हमें बताइए कि रिट याचिका कैसे विचारणीय है। हम इन याचिकाओं के पीछे की मंशा जानते हैं। पहले एक निर्णय हुआ था। उसे पुनर्विचार में बड़ी पीठ ने रद्द कर दिया। अब आप परोक्ष रूप से पुनर्विचार याचिका दायर कर रहे हैं,” CJI ने कहा।
“तैयार रहिए, उदाहरणात्मक जुर्माना भी लग सकता है।”
कोर्ट का रुख सख्त देखते हुए याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जो अदालत ने मंजूर कर ली। साथ ही यह स्वतंत्रता भी दी गई कि याचिकाकर्ता कानून के तहत कोई और उचित उपाय कर सकते हैं।
18 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने दो के मुकाबले एक के बहुमत से मई 2022 के उस निर्णय को पलट दिया था जिसमें केंद्र सरकार को पर्यावरणीय मंजूरी पूर्वव्यापी रूप से देने पर रोक लगाई गई थी।
पीठ ने कहा था कि यदि पूर्व निर्णय को बरकरार रखा गया तो लगभग ₹20,000 करोड़ के सार्वजनिक धन से बने महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स को गिराना पड़ेगा, जिससे अपार नुकसान होगा।
आज की सुनवाई में पीठ ने पूछा कि जब पहले ही तीन-न्यायाधीशों की पीठ निर्णय दे चुकी है, तो एक नई रिट याचिका क्यों दायर की गई।
जयराम रमेश की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि सरकार द्वारा जनवरी में जारी कार्यालय ज्ञापन (office memorandum) के चलते नया कारण उत्पन्न हुआ है। लेकिन CJI ने सवाल उठाया:
“जब यह कोर्ट निर्णय देती है और सरकार उसी के अनुपालन में अधिसूचना जारी करती है, तब आप उस अधिसूचना को चुनौती देंगे? ये याचिका तो सिर्फ मीडिया के लिए दायर की गई है।”
कोर्ट ने दो टूक कहा कि यदि याचिकाकर्ता को फैसले से आपत्ति है, तो उसका उचित कानूनी उपाय पुनर्विचार याचिका है, न कि नई रिट याचिका।
पीठ की स्पष्टता के बाद याचिका वापस ले ली गई।

